Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 40
________________ स्थान रहा है। उन्होंने भारतीय इतिहास में अविस्मरणीय क्षत्रियेतर विशाल साम्राज्य की सर्वप्रथम स्थापना की । नन्द राजाओं की दूसरी विशेषता यह थी कि उन्होंने ब्राह्मण धर्म की सर्वथा उपेक्षा की । नन्दों का राज्य आर्थिक रूप से समृद्ध था । यह विचार प्रसिद्ध इतिहासज्ञ रोमिला थापर ने भारत का इतिहास लिखते समय व्यक्त किये हैं। जैन संदर्भों के अनुसार विश्व विजय का आकांक्षी यवनराज सिंकदर भारत आक्रमण के समय पंजाब से आगे नहीं बढ़ सका, उसका मूल कारण नंदों की शक्ति का ही प्रभाव था। नंदों द्वारा कलिंग जिन की मूर्ति को, कलिंग विजय के समय पाटलीपुत्र ले जाया गया था। वहाँ वह मूर्ति सुरक्षित रही अर्थात् नंदराजा जैन धर्म पर आस्था रखते थे। नंदों का ब्राह्मण विरोध भी उनके जैन होने की ओर इशारा करता है। इतिहासकारों ने भगवान महावीर का निर्वाण काल 527 ई. पूर्व माना है। चंद्रगुप्त मौर्य इसके 155 वर्ष बाद अर्थात ई. पूर्व 372 में चाणक्य की सहायता से मगध का अधिपति बना । चन्द्रगुप्त मौर्य के जन्म के सम्बन्ध में कई विरोधाभासी मत हैं किन्तु कथा सरितसागर, कौटिल्य अर्थशास्त्र एवं बौद्ध साहित्य के आधार पर उन्हें क्षत्रिय माना गया है तथा इसे सुप्रसिद्ध इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। चन्द्रगुप्त मौर्य को भारतीय इतिहास का स्तंभ माना जाता है। तिलोयपण्णत्ति के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य ने जिन दीक्षा धारण की थी । जैन शिलालेखीय प्रमाण भी ऐसा ही सिद्ध करते हैं। यह वह समय है जब भद्रबाहु जैन संघ के आचार्य थे। चाणक्य राजनीति व अर्थशास्त्र के मर्मज्ञ के रूप में चन्द्रगुप्त के मार्गदर्शक थे। इस युग ने राजनीति, धर्मनीति व राज्यशक्ति का अद्भुत समन्वय देखा । चन्द्रगुप्त, चाणक्य और भद्रबाहु इन तीनों के समन्वय के परिणाम स्वरूप शक्तियुक्त चरित्रवान मौर्य साम्राज्य की स्थापना हुई। इसी काल में जैन संगीति भी हुई। इसका उद्देश्य जैन सिद्धान्तों को लिपिबद्ध करना था । यद्यपि जैन सूत्रों के अनुसार चंद्रगुप्त और भद्रबाहु के दक्षिण गमन के कारण ये दोनों ही संगीति में उपस्थित नहीं थे। जैन इतिहास की किसी घटना पर कुछ खोजना अभी भी कठिन कार्य है। किन्तु जैन इतिहास की अंतरधारा केवल राजनीतिज्ञों पर आश्रित नहीं है वरन् चिंतकों पर अधिक आश्रित हैं। इसलिए अमिट चिंतन के माध्यम से काल की उग आई झाड़ियों में से इसे ढूँढ निकालना संभव है। - यहाँ जैन इतिहास के कई सूत्र छिपे हैं। - - करीब-करीब अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि नेमिनाथ कृष्ण पांडवकाल में श्रमण चिंतन का अस्तित्व था । जैन संदर्भों से तो यही संकेत मिलते हैं कि ऋग्वेद के पूर्व भी श्रमण चिन्तन का अस्तित्व था और बहुत बाद में नेमिनाथ ने उसे जनजीवन में प्रचारित किया। काल के अनुकूल नये आयामों का उद्घाटन किया। हो सकता है जनसंख्या के अनुपात में जैन मतावलम्बी कम हों किन्तु जैन मत की विश्वसनीयता अवश्य थी । 38 नन्दकाल और मौर्यकाल में बौद्ध धर्म का भी अपना प्रभाव रहा। जैन मत के मानने वालों में बुद्धिजीवी, व्यापारी एवम् हस्तशिल्पकार थे। इसका परिणाम था कि बाहर भले ही नहीं दिखाई दे किन्तु जैन मतावलंबी भारतीय समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा थे। आगे की कई शताब्दियों में मूर्तियों और मंदिरों के प्रतिष्ठाकारक जन साधारण में से लोग थे। यहाँ तक कि वेदों द्वारा प्रतिपादित शूद्र और निम्नजाति के लोगों ने जैन धर्म के अर्हत् वचन, जनवरी 99

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