Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

View full book text
Previous | Next

Page 33
________________ अर्हत् वचन कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, इन्दौर आधुनिक युग में जैन धर्मावलम्बी सराक एवं अन्य सम्बद्ध आदिवासी जैन बन्धुओं की ओर ध्यान आकृष्ट करने का श्रेय लेफ्टिनेन्ट कर्नल डाल्टन (Lt. Col. Dalton) को जाता है, जिन्होंने 1864-65 के मध्य अपने नोट्स में इस जाति की अवस्थिति, रीति रिवाजों एवं क्षेत्र के पुरावशेषों पर प्रकाश डाला। बाद में ब्र. शीतलप्रसादजी, डॉ. अगरचन्द नाहटा, पं. कैलाशचन्द्र सिद्धान्ताचार्य, पं. बाबूलाल जमादार आदि अनेक लेखकों द्वारा समय-समय पर जनजाग्रति हेतु प्रेरणात्मक लेखन किया जाता रहा। ब्र. शीतलप्रसाद, क्षु. गणेश वर्णी, क्षु, जिनेन्द्र वर्णी, क्षु. मनोहर वर्णी आदि की परोक्ष प्रेरणा एवं बाबू बैजनाथ सरावगी, बाबू शिखरचन्द, श्री हरखचन्द पांड्या आदि महानुभावों के सतत समर्थन / संरक्षण से सराक बन्धुओं से सम्पर्क की यह मशाल जलती रही, किन्तु सराक बन्धुओं से सतत सघन सम्पर्क कर उनके स्थितिकरण एवं उन्हें समाज की मुख्य धारा में सम्मिलित करने हेतु समन्वित प्रयास सराकोद्धारक, युवा उपाध्याय पूज्य मुनि श्री ज्ञानसागरजी महाराज की प्रेरणा से 8वें एवं 9वें दशक में ही मूर्त रूप ले सके हैं। इस प्रक्रिया में विपुल परिणाम में सराक विषयक 1. लेख एवं पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं किन्तु सम्यक जानकारी के अभाव में सक्रिय कार्यकर्ताओं को भी अब तक प्रकाशित अनेक महत्वपूर्ण जानकारियों से वंचित होना पड़ता है। सराक बन्धुओं की सामाजिक / आर्थिक स्थिति उनकी परम्पराओं, प्रतिबद्धताओं एवं पारम्परिक ज्ञान पर व्यवस्थित शोध की नितान्त आवश्यकता है। शोधकों की सुविधा हेतु मैं विभिन्न स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर अब तक प्रकाशित सराक विषयक सामग्री को सूचीबद्ध कर रहा हूँ। मुझे यह देखने को मिला है कि अनेक लेखों में पूर्व प्रकाशित सामग्री को ही प्रस्तुत किया गया है तथापि प्रचार- प्रसार में प्रत्येक लेख / टिप्पणी ने अपनी भूमिका निभायी है, इस कारण मैं प्राप्त समस्त उपलब्ध एवं ज्ञात जानकारी को वर्षानुसार सूचीबद्ध कर रहा हूँ. 1864 : Lt. Col. E. T. Dalton (Commisioner of Chhota Nagpur writes in his notes on a tour in Manubhoom in 1864-65), 'The Saraks (A Sect of the Jains)', Journal Asiatic Society of Bengal, Volume XXXV Part I, P. 1866, हिन्दी अनुवाद सराक ज्योति (मेरठ), अक्टूबर 1988, पृ. 20-21 : 'श्राक (श्रावक) जाति के उद्धार की संभावना', जैन गजट ( अजमेर) 1923 1931 1938 वर्ष - 11, अंक- 1, जनवरी 99, 3135 सराक साहित्य - एक सर्वेक्षण ■ अनुपम जैन 1949 : 'बंगाल प्रान्त में प्रचार का सुयोग व आवश्यकता', डॉ. अगरचन्द नाहटा, जैन संदेश (मथुरा), 4. 8. 1949, पुनर्मुद्रित सराकोत्थान 1996 : 'क्या यह प्राचीन जैन अहिंसा संस्कृति नहीं है ?', जैन सन्देश, 17.6.54, पुनर्मुद्रित - सराकोत्थान 1996 'प्राचीन जैन समारकों के प्रति जैन समाज की उदासीनता, पं. बाबूराम बजाज, जैन सन्देश, 7.10.54, पुनर्मुद्रित सराकोत्थान 1996 सचिव- कुन्दकुन्द ज्ञानपीठ, ज्ञानछाया, डी-14, सुदामानगर, इन्दौर - 452009 1954 : ब्र. शीतलप्रसाद जी के लेख, जैनमित्र (सूरत) 'सराक जाति के उद्धार का उपाय', ब्र. शीतलप्रसादजी जैन, जैनमित्र, श्रावण सुदी 2, वी.नि.सं. 2464, सराकोत्थान प्रेरणा के स्वर, सं. - डॉ. अशोककुमार जैन, आचार्य शान्तिसागर छाणी ग्रन्थमाला, बुढ़ाना (मुज्जफरनगर), 1996 (संक्षेप में सराकोत्थान- 1996) -

Loading...

Page Navigation
1 ... 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83 84 85 86 87 88 89 90 91 92 93 94 95 96 97 98 99 100 101 102 103 104 105 106 107 108 109 110 111 112