Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 20
________________ 2 छन्नों में छानना एक विशिष्ट कार्य था। पानी के बासी मटके को धोकर दूसरे में छान देने के पश्चात् कुए से ताजा पानी भरा जाता है। पानी छानने के बाद छन्ने को हौले से एक जलपात्र में उलटकर धोया जाता है, ताकि जीवाणु पुन: जल में आ जायें और वह जल फिर से कुए में डाल दिया जाता है, इसे विच्छन कहते हैं। पीने योग्य पानी को घनौथी पर रखा जाता है, यह ऊपर रखा जाता है तथा सूर्य की किरणों के निरन्तर सम्पर्क में रहें इसका ध्यान रखा जाता है। प्रत्येक बर्तन को ढंककर रखा जाता है। सूर्य की किरणों के सम्पर्क में यह जल ऊर्जावान तथा घातक बैक्टीरिया रहित, प्रासुक हो जाता है। शायद ही विश्व में अन्यत्र कहीं यह प्रक्रिया होती होगी, मात्र जीव दया के लिये। इसके बाद ही महिलाओं का रसोई में प्रवेश होता है। सराक महिलाओं को वंश परम्परा से ही यह शिक्षा मिली होती है कि चौके में झाडू लगाकर बिना चूल्हे को कपड़े से झाड़कर साफ किये बिना चूल्हा जला देना अमंगल सूचक है। रोज नियमित रूप से चौके की छत , खिडकियों पर से धूल झाड़ देने से 2 उपवास का फल मिलता है ऐसी उनकी धारणा है। जबकि इसकी गहराई में जीवदया का भाव है। चूल्हे को झाड़ने से रात्रि में आ बैठे सूक्ष्म जीव उसके जलने से पूर्व ही सुरक्षापूर्वक निकल जायें और छत दीवालों पर जाले आदि न जमने पायें ताकि जीवों के घात का अवसर ही उपस्थित न हो। गांवों में चूल्हे की छत पर चंदोबा लगाने का भी रिवाज है जिससे खपरैल, मिट्टी की छत, लकड़ी की कड़ी की छत से रेंगता कोई सूक्ष्म या बड़ा जीव चूल्हे पर उबलते पदार्थ में न गिर जाये या अपने मुख का विष या लार भोज्य पदार्थ में न गिरा दे। छिपकली और अन्य ऐसे जीव तो प्राय: दीवालों पर घूमते हैं। उनसे बचने का यह सर्वोत्तम विवेकपूर्ण उपाय इनके पास है। चौके में पहनने तथा चौके में प्रयोग किये जाने वाले कपड़े रोज धोकर खुली धूप में सुखाये जाते हैं। सराक क्षेत्र उड़ीसा, बिहार में कहीं-कहीं जलाभाव भी है इसलिये राख में सूखे बर्तन मांजने का प्रचलन है किन्तु बर्तनों को मांजने से पूर्व उसमें लगा अन्नांश पानी से धोकर घर के बाहर बनी कुण्डी में डाल दिया जाता है जिसे गाय बैल चलते फिरते पी जाते हैं। वैसे तो राख में मंजे बर्तनों को कपड़े से रगड़कर साफ कर लिया जाता है फिर भी खाना बनाने के बर्तनों को फिर से स्वच्छ जल से धोकर काम में लेने और धोवन को एक पात्र में अलग रख दिया जाता है। दूज, पंचमी, अष्टमी, ग्यारस, चतुर्दशी आदि तिथियों को हरी तरकारी चौके में नहीं बनती है। जमीकन्द, आलू, शकरकन्द आदि भी कुछ लोग अपने घरों में नहीं बनाते हैं। जो आलू खाते हैं वे होली से दिवाली के बीच खाते हैं। वृक्षों पर पहले आये फलों को देवालय में चढ़ाते हैं, उन्हें नहीं खाते। बाइस अभक्ष्यों में द्विदल भी प्रधान है। द्विदल अर्थात् वह अन्न जिसके दलने पर समान दो टुकड़े हो जायें जेसे अरहर, मूंग, चना इत्यादि। कहते हैं इसका कच्चे दही के साथ उपयोग अभक्ष्य होता है अर्थात् जब कढ़ी में या दहीबड़ों में दही डाला जाता है तो गरम करके डालने की प्रथा है ताकि अभक्ष्य न हो जाये। तरकारी के लिये भिगोये गये चना, राजवां, मोंठ, मटर रात्रि के बारह बजे के बाद भिगोये जाते हैं ताकि अंकुरित होकर अभक्ष्य न हो जाये। रसोई बनाते समय या बाद में खाद्य वस्तुओं को ढंककर रखना तो एक प्रधान कर्तव्य माना जाता है। भूलवश यदि रात्रि में वस्तु (रांधी हुई) उघाड़ी रह जाती है तो उसे पशुओं के खाने के लिये डाल दिया जाता है। सुबह का बना खाना शाम को तो सराक समाज प्रयोग में लाते हैं किन्तु बासी भोजन का निषेध अभी भी है। बचे हुए फुलकों (रोटियों) को तुरन्त तवे पर सेंककर खाखरा बना लिया जाता है ताकि वे फफुन्दी या बैक्टीरिया रहित रह सकें। घर में पापड़ बनाने पर कोई बासी न हो जाये, उन्हें बेल लिया जाता है चाहे रात के बारह ही क्यों न बज जाये। जूठे बर्तनों को शीघ्र ही साफ किया जाता है क्योंकि मुँह के लार थूक के स्पर्श से उनमें एक घडी पश्चात् ही असंख्य संमूर्छन जीवों की उत्पत्ति हो जाती है। सराक बुजुर्गों में इसी लिहाज से खाना खाने के पश्चात् थाली धोकर पीने की परम्परा है। जीवदया के विचार से गर्म तवा कभी जमीन पर नहीं रखा जाता, गर्म जल, मांड आदि मोरी/नाली में नहीं डाला जाता है क्योंकि उनसे सूक्ष्म जीवों के जलकर मर जाने का अर्हत् वचन, जनवरी 99 18

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