Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 24
________________ सम्मिलित थे। वैदिक साहित्य में कलिंग (वर्तमान उड़ीसा) का कोई उल्लेख नहीं है। महाभारत में उसका वर्णन एक अन्य प्रदेश के रूप में हुआ है। जिसका राजा चित्रांगद था। धर्म सूत्रों में इसे म्लेच्छ देश कहा है और वहाँ जाने वालों को पातकी कहा है। इस प्रकार ब्राह्मण परम्परा में कलिंग देश चिरकाल तक एक अनार्य, अवैदिक देश रहा। बौद्ध ग्रन्थों में कलिंग देश और उसकी राजधानी दन्तपुर के अनेक उल्लेख हैं। जैन साहित्य और अनुश्रुतियाँ में कलिंग देश के अनेक उल्लेख मिलते हैं। बौद्ध ग्रन्थ 'आर्य मंजु श्री' मूलकल्प ई. 983 में जो तिब्बतीय भाषा में अनूदित हुआ था। उसमें एक अध्याय है, जिसमें ई. 770 के तक के भारतीय राजवंशों का वर्णन है। उसमें ऊँचे साधकों की गिनती में कलिङ्ग के ऋषभ का नाम लिखा गया है। कलिङ्ग के सर्वप्राचीन उपलब्ध पुरातत्वावशेष जैन है और इस देश में प्राचीन काल से ही जैन तीर्थंकरों की मान्यता रही है। राज्य के इष्टदेव 'कलिंग जिन' कहलाते थे और यह प्रथम तीर्थंकर ऋषभ थे। महावीर के जन्म के पूर्व भी इस जनपद में 'कलिंग जिन' की प्रतिष्ठा थी। इक्कीस तीर्थंकरों के बाद महाभारत युग में अरिष्टनेमि का लोगों में बड़ा आदर था। हरिवंश पुराण में लिखा है कि कृष्ण, वसुदेव और आखिर कलिंग के राजा जबरदस्ती प्रभावती को लेने गये। जरासंधु या पांडवों के जमाने में बहुत बड़ी तादाद में जैन दीक्षा ग्रहण करने वाले लोग थे। वनवास काल में अर्जुन ने रामगिरि में जैनमूर्ति का दर्शन किया था। अत: इसमें आश्चर्य नहीं कि महाभारत काल में जैन धर्म का प्रचार हुआ। कारण यह था कि मूलनीति और ब्राह्मण धर्म में ज्यादा फर्क न था और जैनों के धर्मगुरुओं के प्रति हिन्दुओं में श्रद्धा थी। ऋषभदेव को वे अवतार मानते थे। अतएव अरिष्टनेमि द्वारा प्रचारित जैन धर्म आम जनता के लिये एक जागृत धर्ममत के रूप में आर्द्रत था और ई.पू. 1400 से लेकर ई.पू. 500 तक आर्यावर्त में व्यापक हो गया था। 'हरिवंश' तथा 'महाभारत' में रैवतकगिरि का वर्णन है और यह पर्वत जैनियों का गिरनार तीर्थ है। ई. पू. 820 में भ. पार्श्वनाथ का आविर्भाव हुआ। उनके पिता अश्वसेन वाराणसी के राजा थे और माँ वामादेवी अवध के राजा प्रसेनजित की कन्या थी। पार्श्वनाथ ने राजघाट छोड़कर तपस्या की और कैवल्य पद प्राप्त होने पर धर्म का प्रचार - प्रसार किया। बंगाल . से गुजरात तक उनका धर्म प्रसारित हो गया था। ज्यादातर लोगों ने जैन धर्म दीक्षा ली। उन्होंने सम्मेदशिखर पर निर्वाण लाभ प्राप्त किया। उनके नाम से ही सम्मेदशिखर 'पार्श्वनाथ हिल' नाम से जाना गया। उनके काल में उत्कल में जैन धर्म का प्रचार - प्रसार भी हुआ। खण्डगिरि में अनन्तगफा की पार्श्वनाथ की मर्ति के ऊपर एक सांप है। यह उत्कलीय पार्श्वनाथ का एक खास चिन्ह है। महेन्द्र पर्वत की पार्श्वनाथ मूर्ति सहस्त्र सर्पो के फनों से आच्छादित है। तीर्थकर पार्श्वनाथ का विहार कलिंग देश में हुआ था। . भगवान महावीर ई. पूर्व. 557 में अपने जीवन की 42 साल की उम्र में तीर्थंकर बने थे। जम्मिक नाम के गांव में केवलज्ञान प्राप्त किया। बारह वर्ष तक गंभीर चिंतन और अन्तर्दृष्टि के साथ जीवन व्यतीत करने के पश्चात् उनको ज्ञान लाभ हुआ। भगवान महावीर भी कलिंग देश में पधारे थे और राजधानी कलिंग नगर के निकट कुमारी पर्वत पर उनका समवशरण लगा था। इसकी स्मृति में उक्त स्थान पर स्तूपादि स्मारक बने थे अर्हत् वचन, जनवरी 99 22

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