Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 25
________________ और मुनियों के निवास के लिये गुफाएँ भी निर्मित हुई थीं जो खारवेल के समय के बहुत पहले से वहाँ विद्यमान थी। इन सब बातों से विदित होता है, जैसा कि प्रो. राखानदास का भी मत है, कि उड़ीसा प्रारंभ से जैन धर्म का प्रमुखगढ़ था। वस्तुत: इस प्रदेश में आर्य सभ्यता और संस्कृति के प्रवेश का श्रेय जैन धर्म को है। एक समय जैन धर्म पश्चिम भारत में भी व्याप्त था, फिर भी मगध, अंग, बंग और कलिंग इस धर्म के मुख्य क्षेत्र थे और मगध और कलिंग के साम्राज्य का धर्म था। . - छठी शताब्दी ई. पूर्व में कलिंग देश पर जितशत्रु नामक राजा का राज्य था जो महावीर के पिता राजा सिद्धार्थ का मित्र और बहनोई था। इसकी कन्या यशोदा के साथ महावीर के विवाह की बात चली थी किन्तु महावीर ने आजन्म ब्रह्मचारी रहने का दृढ़ निश्चय कर लिया था अत: विवाह न हो सका। जितशत्रु के वंशजों ने नन्दकाल पर्यन्त इस देश पर निर्वाध शासन दिया। ई. पू. 4 थी सदी में मगध नरेश महापद्मनन्द ने कलिंग पर आक्रमण किया था और उस राज्य को अपने साम्राज्य का अंग बनाया। वह कलिंग विजय के प्रतीक रूप में 'कलिंग - जिन' प्रतिमा को अपनी राजधानी राजगृह को ले आये थे और अपनी राजधानी पाटलिपुत्र में प्रतिष्ठित करने का लोभ संवरण न कर सका। इसलिये ई. पू. 4 थी सदी में भी कलिंग में जैन धर्म राष्ट्रीय धर्म के रूप में प्रतिष्ठित था ऐसा नि:संदेह कहा जा सकता है। ई.पू. 3सरी सदी में अपने राज्य के 8 वें वर्ष में एक भारी सेना लेकर मगध के सम्राट अशोक ने कलिंग पर आक्रमण किया। इस युद्ध में कलिंग के एक लाख आदमी मारे गये, डेढ़ लाख बन्दी किये और बहुत से लोग युद्ध के परिणाम से मारे गये। इस भीषण नरसंहार ने अशोक को विचलित कर दिया, उनकी मनोवृत्ति में भारी परिवर्तन हुआ और वह एक शान्तप्रिय, धर्मात्मा नरेश बना। अशोक ने अपने 13 वीं अनुशासन में स्वीकार किया है कि कलिंग युद्ध में ब्राह्मण तथा श्रमण सम्प्रदाय के लोगों ने दुःख भोगा था। अशोक ने जिनको श्रमण कहा है वे नि:संदेह जैन थे। एक बात ध्यान देने योग्य है कि कलिंग के भाग्यविपर्यय में अशोक आंसू गिराकर रोते थे यह सही है, मगर नन्दराजा के द्वारा अपहृत 'कलिंग - जिन' प्रतिमा को उन्होंने भी नहीं लौटाया। लगभग तीसरी शताब्दी ई. पू. के अन्त में मौर्य सम्राट के शासन के अंतिम वर्षों में कलिंग फिर से स्वतंत्र हो गया। खारवेल कलिंग के सिंहासन पर बैठा। यह एक नवीन राज्यवंश 'एल' से सम्बन्धित था जो कलिंग के किसी प्राचीन राज्यवंश की शाखा थी। कुछ विद्वानों के अनुसार क्षेमराज का पुत्र बुद्धिराज था और उसका पुत्र भिक्षुराज खारवेल था, किन्तु कुछ विद्वानों का मत है कि ये सब खारवेल की ही अपनी उपाधियाँ थी। जो भी हो, इसमें सन्देह नहीं कि खारवेल के पितामह ने ही इस राज्यवंश की स्थापना की थी और कलिंग को स्वतंत्र किया था। खारवेल के पिता की मृत्य उनके पिता के जीवन काल में ही हो गई थी। अतएव खारवेल अपने पितामाह के पश्चात गद्दी पर बैठा। नन्दराजा के कलिंग पर अधिकार करने के बाद भी जैन धर्म उत्कल से अन्तर्हित नहीं हुआ था बल्कि विभिन्न राजवंशों की परोक्ष पोषकता के कारण भ. महावीर जिनेन्द्र अर्हत् वचन, जनवरी 99

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