Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 15
________________ कलिंग में पुन: स्थापित की। यह घटना दो बातों को इंगित करती है, प्रथम तो यह कि लगभग चार सौ वर्ष तक कलिंग वासियों के मन में इस प्रतिमा की स्मृति बनी रही। दूसरे जैन मंदिर व मूर्तियों के निर्माण की परम्परा ई.पूर्व 400 वर्ष पहले विद्यमान थी। पटना के पास लोहानीपुर नामक स्थान से प्राप्त अब पटना संग्रहालय में सुरक्षित सिर विहीन जैन प्रतिमाओं के धड़ भी इतिहासकारों ने ई.पू. 400 वर्ष से पहले के माना है। कलिंग जिन की प्रतिमा अब कहाँ है? डा. बलभद्र जैन इसे जगन्नाथपुरी के प्रसिद्ध मंदिर में कलेवर परिवर्तन की परम्परा में देखते हैं। कलेवर परिवर्तन के समय पुजारी की आँखों पर पट्टी बंधी होती है और पुराने कलेवरों में से मूर्ति निकालकर नये कलेवर में रख दी जाती है" पं. बाबूलाल जैन जमादार ने एक अन्य घटना का विवरण इस प्रकार किया है- "भगवान जगन्नाथ के मुख्यद्वार पर जहाँ से यात्री दर्शन करने अन्दर जाता है एक शीशे से जड़ी अलमारी में वर्षों पुरानी वीतराग भगवान श्री शान्तिनाथ स्वामी की प्रतिमा विराजमान है जिसकी पहचान तत्कालीन पुलिस अधीक्षक रायबहादुर केसरे हिन्द श्री सखीचन्द पध्यान ने की थी। किन्हीं दुष्ट धर्मद्रोही व्यक्तियों ने अभी-अभी (एक दो दिन के भीतर) मूर्ति का लिंग छेदन करके अपनी मदान्धता का परिचय दिया है। उन्होंने लिखा है कि कलेवर परिवर्तन के समय हृदय स्थल में भगवान चन्द्रप्रभु की प्रतिमा को रखा जाता है किन्तु काफी खोजबीन करने पर भी इसकी पुष्टि नहीं हो सकी। यहाँ यह दृष्टव्य है कि भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा आषाड़ सुदी 2 को होती है जो भगवान आदिनाथ का गर्भ कल्याणक है (कलेवर में प्रतिमा नाभि स जाती है), भगवान के 1008 नामों में एक नाम जगन्नाथ भी है। रथ यात्रा महोत्सव हिन्दू समाज में केवल जगन्नाथ भगवान से ही सम्बन्धित है, हिन्दूओं के अन्य पर्वो पर शोभायात्राएँ तो निकाली जाती हैं, भगवान को रथ में बैठाकर रथयात्रा केवल जगन्नाथ भगवान से ही सम्बन्धित है। मेरे एक मित्र जो शेयरों का काम करते हैं, भुवनेश्वर जाते रहते हैं, उन्होंने भी मुझसे कहा था कि पुरी के मंदिर के दक्षिण द्वार की दीवार में शीशे के फ्रेम में एक दिगम्बर प्रतिमा विराजमान है। मगध नरेश महापदमनन्द के समय सराक क्षेत्र जैन धर्मावलम्बी था। तदुपरान्त सम्राट चन्द्रगुप्त व बिन्दुसार स्वयं जैन थे। सम्राट चन्द्रगुप्त को अपने साथ लेकर दक्षिण की ओर जाने वाले स्वामी भद्रबाहु कलिंग देश में ताम्रलिप्ति के निवासी थे। आचार्य अर्हद्बली का जन्म स्थान पुण्ड्रवर्धन भी इसी क्षेत्र में माना जाता है। ई. सन् 478 के एक ताम्रपत्र पर वट गोहाली ग्राम में निर्ग्रन्थ श्रमण आचार्य गुह्यन्दि के जैन विहार का वर्णन किया गया है। स्वाभाविक ही सराक क्षेत्र जैन संस्कृति एक ऐसा प्राचीनतम क्षेत्र है जहां भगवान महावीर के समय से पूर्व से ही और कहीं-कहीं तो भगवान पार्श्वनाथ के समय से ही निरन्तर जैन परम्पराओं का निर्वहन आज तक हो रहा है। यहाँ उपलब्ध कुछ प्रतिमाओं की प्राचीनता भी असन्दिग्ध है। कटक के चन्द्रप्रभ जैन मंदिर में गुप्त काल की प्रतिमाओं के चित्र पं. बलभद्र जैन की पुस्तक में प्रकाशित हैं। भानुपुरा ग्राम की मूर्तियाँ भी समकालीन हैं। पं. बाबूलाल जैन जमादार ने अनाईजामबाद में भूगर्भ से प्राप्त व अन्य प्रतिष्ठित 5 फुट ऊंची भगवान पार्श्वनाथ भगवान की प्रतिमा को 2000 वर्ष प्राचीन बताया है। इस गांव के मंदिर में स्थापित दो मूर्तियों के चित्र उपलब्ध हैं जिसमें एक में चौबीसी भी है। केवल चित्रों से यह नहीं कहा जा सकता है कि वे कितनी प्राचीन हैं। स्पष्टत: ही वे सन् 1000 ई. से पूर्व की प्रतीत होती हैं। श्री जमादार ने कटक के दो जैन मंदिरों अर्हत् वचन, जनवरी 99

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