Book Title: Arhat Vachan 1999 01
Author(s): Anupam Jain
Publisher: Kundkund Gyanpith Indore

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Page 14
________________ ऋजुपालिका नदी के किनारे एक लघु विजय अभियान छेड़ा था। जैन धर्म को क्षत-विक्षत करने का और इस अभियान के अन्तर्गत उसने मृदावली (मुंगेर) से ऋजुपालिका नदी के किनारे उन सभी स्थानों को नष्ट किया जो जैन धर्म से सम्बन्धित थे। इस अभियान के मार्ग में अनेक गांवों के नाम बदलकर उसने गोविन्दपुर रख दिया और आज भी अनेक गांव इस नाम के उस अंचल में हैं। अहिंसा के पुजारी, अहिंसा के प्रणेता का कोई चिन्ह शेष न रहे इसलिए उसी ने अजयनदी के दोनों किनारों पर पशुबली के केन्द्र स्थापित किये। इसी आधार पर लेखकों ने दोनों चिचुरबिल गाँवो से चार मील पश्चिम की ओर स्थित जाम ग्राम को गढदिगम्बर नाम की पहाड़ी की तलहटी में माना है। इस गॉव के पास देवता विहीन एक मंदिर है और एक नवनिर्मित शिव मंदिर भी है। यह नया मंदिर पुरातन मंदिर के अवशेषों पर बना है और लेखक द्वय का मानना है यही वैयावृल चैत्य है। देवता विहीन मंदिर की दीवारों पर एक शिलालेख को पढ़ा जाना शेष है। इस मंदिर से नदी 50 गज की दूरी पर है और इस क्षेत्र को सामापुर (सामागस्स) कहाँ जाता है। जंभीय ग्राम की पूर्वी सीमा पर सरिसासली गांव के पास सिंह शीर्ष प्रस्तर स्तंभ भी खड़ा है जिसके नीचे अजयपाल ने हनुमान की मूर्ति खुदवा दी थी। लेखकों की मान्यता है कि गढ़ दिगम्बर पहाड़ जो नाम से ही जैन प्रतीत होता है वहां कुन्डेनेश्वर (महावीर भगवान) मंदिर था उसे काण्डेश्वर शिव मंदिर में परिवर्तन किया गया और पशुबली आरंभ करवा दी गई। प्रसिद्ध देवधर वैद्यनाथ धाम से यह जंभीय ग्राम 40-42 मील दूर है। जैन शास्त्रों में वर्णित अन्य स्थान भी आस - पास ही है। सराक क्षेत्र से सम्बन्धित यह लेख मैं लघु रूप में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ। विभिन्न लेखकों, जैन पुराण एवम् अन्य जैन ग्रन्थों के तथ्यों को अपनी भाषा में लिखने का ही यह प्रयास है। निश्चित रूप से सराक क्षेत्र ही प्राचीनतम जैन मतावलम्बियों, का निवास स्थान है। भगवान महावीर के अंतिम छ: वर्षायोगों की भूमि यहीं पावन स्थली है भगवान महावीर के इस क्षेत्र में बिहार के तथ्य हरिवंश पुराण में उल्लेखित कुछ घटनाओं से स्पष्ट हो जाते हैं। कलिंग देश के राजा जितशर्मा को महावीर के पिता श्री सिद्धार्थ की छोटी बहन यशोधरा ब्याही थी। उनकी पुत्री यशोदा से सिद्धार्थ अपने पुत्र का ब्याह करना चाहते थे, राजा जितशर्मा भी सन्तुष्ट थे किन्तु विवाह से पूर्व ही भगवान महावीर वैराग्य धारण कर ज्ञातवन को प्रस्थान कर गये। जितशर्मा ने तब भगवान से कलिंग देश में बिहार की प्रार्थना की थी। भगवान का विहार राजगृही से कलिंग देश तक हुआ था। बाद में जितशर्मा व उनकी पुत्री ने दीक्षा ली और संभवत: खण्डगिरि के कुमारी पर्वत से अपने जीवन के अंतिम दिन सल्लेखणापूर्ण ढंग से व्यतीत किये। संभव है यशोदा की तपश्चर्या के कारण उनकी कुमारी अवस्था में तपश्चर्यारता हो जाने से पर्वतका नाम कुमारी पर्वत पड़ गया हो। कलिग देश में ही तोषल नरेश सिद्धार्थ के बन्धु थे। उन्होंने भी भगवान महावीर को अपने राज्य में धर्म प्रचार के लिए आमंत्रित किया था। उनके उपदेश से प्रभावितहोकर तोषल नरेश ने मुनि दीक्षा लेकर इसी कुमारी पर्वत से मोक्ष को प्राप्त किया। भगवान महावीर द्वारा प्रचारित धर्म सदियों तक कलिंग देश के जन मानस में स्थान बनाये रहा। इतिहास की एक अन्य घटना कलिंग जिन की प्रतिमा की है - मगध नरेश महापदमनन्द इस प्रतिमा को कलिंग सिरविहीन जैन प्रतिमा विजय कर मगध ले आया था। उसके चार सौ वर्ष पश्चात सम्राट चौथी शताब्दी ई.पू. खारवेल ने मौर्य सम्राट वृहस्पतिभिज्र को पराजित कर यह प्रतिमा पटना संग्रहालय अर्हत् वचन, जनवरी 99 12

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