Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04 Author(s): Gokulprasad Jain Publisher: Veer Seva Mandir Trust View full book textPage 9
________________ संत साहित्य मोर जन अपभ्रंश काव्य है। भारतीय साधना धारा मे जैन मुनियों के 'कृच्छ' के इस प्रकार जैन धारा जिन बातों में अपना स्थान विपरीत ही 'सहज' साधना और साध्य की बात सभव पृथक रखती पा रही है-(१) परतत्व की द्वयात्मकता हैं कि प्रचलित हुई हो। अध्यात्म साधना मे मन का एकाग्री (२) द्वत की ममस्तविष निवेध तथा (३) वासना शोधन करण विक्षेप मूल वासना या काषाय के शोषण से तो का सहज मार्ग-उन प्रागमिक विशेषतामों का प्रभाव मण' मानते ही थे. दूसरे प्रवत्तिमार्गी प्रागमिक साधक प कायों में उपलब्ध होता है। BETET की ऐसी कुशलता सहज पा लेना चाहते थे कि वासनारूप भाषाबद्ध अन्यान्य रचनामों मे पागमसवादी सतो की जल में रहकर ही विपरीत प्रवाह में रहना उसे पा जाय। पारिभाषिक पदावलियां इतनी अधिक उदग्र होकर भाई साधको को यह प्रक्रिया दमन की अपेक्षा अनुकूल लगी। है कि जैन कवियों या मनियो का नाम हटा देने पर तदर्थ वासनाजन्य की मघवर्ती स्थिति का उध्वकिरण पर्याप्त भ्रम की गंजाइश है। अगमित था। जैन साधको के अपभ्रश काव्य मे सकेत इन महत्वपूर्ण प्रभावों के अतिरिक्त ऐसी कई पौर खोजे जा सकते हैं-पर भाषाकाव्य मे कबीर बाद स्पष्ट भी बातें है जिन्हें सतों के सदर्भ में देखा जा सकता कथन मिलने लगते है । जैन मरमी मानदधन की रचनाए है। उदाहरण के लिए -(१) पुस्तकी ज्ञान की निंदा साक्षी है । वे कहते है (२) भीतरी साधना पर जोर (३) गुरु की महत्ता (४) प्राज सुहागन नारी, अवधू माज सुहागन नारी। बाह्याचार का खडन प्रादि । मेरे नाथ पाप सुध लोनी, कोनी निज मंगचारी। (१) पागम 'वहिर्याग' की अपेक्षा 'प्रतर्याग' को प्रेम प्रतीति राग रुचि रंगत, पहिरे झीनी सारी। महत्ता देते है और सैद्धान्तिक बोध को अपेक्षा व्यावहारिक महिती भक्ति रंग की रांची, भावजन सुखकारी। साधना को भी । सैद्धान्तिक वाच्यबोध मे जीवन खपाने सहज सुभाव बुरी मै पहिनी, थिरता कंकन भारी॥ को प्रत्येक साधक ध्यर्थ समझता है-यदि वह क्रिया के इत्यादि... प्रग रूप में नहीं है । सतो ने स्पष्ट ही कहा है--"पोथी इन पंक्तियों में क्या 'सतो' का स्वर नही है ? सतो पढ़ि-पढ़ि जग मप्रा पडित भया न कोय" । परमात्म प्रकाश की भांति इन अपभ्रंश जैन कवियों में भी 'सहज' शब्द का सार का काहना है-- प्रयोग साधन और साध्य के लिए हुआ है । मानन्दतिलक ने सस्थ पढ़तुं विहोइ जहु जो ण हणोह वियप्पु । 'प्राणदा' नामक काव्य मे स्पष्ट कहा है कि कृच्छ साधना बहि वसंतु विणिम्मलक णावि मउह परमप्पु ।। से कुछ नही हो सकता, तदर्थ 'सहज समाधि' प्रावश्यक शास्त्रानुशीलन के बाद भी यदि विकल्प जाल का विनाश न हुया तो ऐमा शास्त्रानुशीलन किस काम का ? जापु जबाइ बहु तव तवई तो विण कम्म हणोइ। इसी बात को शब्दान्तर से 'योगसार' कार ने भी कहा सहज समाधिहि जाणियइ माणवा ने जिण सासणि साह । जो वि जण प्रप्यु पर वि परमाउ चएइ । इसी प्रकार मुनि जोगीन्दु ने भी कहा है कि सहज जो जाणत सत्य इं समल गहु सिव सुबस लहेह ।। स्वरूप में ही रमण करना चाहिए जिसने मकल शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करके भी यह सहज सहवह जइ रमहि तो पायहि सिव सन्तु न जाना कि क्या उपादेय और हेय है-प्रात्मीय भौर (योगसार) परकीय है, सकीर्ण स्वपर भाव में व्यस्त रहकर जिसने सहज स्वरूप में जो रमता है-वही शिवत्व की परभाव का त्याग नहीं किया-यह शिवात्मक सुख की उपलब्धि कर सकता है। छोहल ने तो चरमप्राध को उपलब्धि किम प्रकार कर सकता है ? इसी प्रकार दोहा 'सहजानद' ही कहा है --- "हउ महजाणद सरूव सिंह" पाहड़कार का भी विश्वास है कि जिस पंडित शिरोमणि रामसिंह तो सहावस्था की बात बार-बार कहते हैं। ने पूस्तकीय ज्ञान में तो जीवन खपा दिया, पर प्रान्म लाभPage Navigation
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