Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 7
________________ संत साहित्य और जन अपभ्रंश काव्य चलन सिव के पोर जाय जब सक्ती लीन्हा । देखना असम्भव लगता है। जैन धारा कृच्छ एवम् पच्छेदफिर सक्ती भी ना रहे, सक्ति से सीव कहाई । वादी होने से शरीर स्वयं ससार से पूर्ति विरक्त दृष्टि अपने मन के फेर और ना दूजा कोई। रखता है। यही कारण है कि जैन साहित्य मे यही निर्वेदसक्ती शिव है एक नाम कहने को दोई। भाव पुष्ट होकर शांत रस के रूप में लहराता हुपा पलटू सक्ती सीव का भेद कहा प्रलगाय । दृष्टिगोचर होता है। शृगार का चित्रण सर्वदा उनकी सुरति सुहागिनि उलटि के मिली शब्द में जाय। कृतियों मे विदसावसामो और वैराग्यपोषक रूप मे हमा पलटूदास की इन पक्तियो के साक्ष्य पर उक्त स्थापना है। जैन काव्य का प्रत्येक नायक निर्वद के द्वारा अपनी कि प्रागमिक दृष्टि ही सतों की दृष्टि है, सिद्ध हो जाती हर रंगीन और सांसारिक मादक वृत्ति का पर्यवसान 'शांत' में ही करता है। प्रागम की भांति सतजन भी बहिर्याग की अपेक्षा पर इन तमाम भेदक तत्त्वो के बावजूद छठी-सातवी अंतर्याग की ही महत्ता स्वीकृत करते है पोर इस पतर्याग शती के ताधिक मत के प्रभाव-प्रसार ने जैनियों पर भी को कार्यान्विति 'गुरु' के निर्देश में ही सभव है। आगमो प्रभाव डाला--फलतः कतिपय अपभ्रश-बद्ध जैन रच. की भांति सतजन मानते है कि गुरु की उपलब्धि पारमेश्वर नामों में 'सत' का-सा स्वर भी धतिगोचर होता है । चरम पनुग्रह से ही संभव है। यह गुरु ही है जिसकी उपलब्धि लक्ष्य से विछिन्न फलतः विजडित एवम् रूढप्राय प्राचार होने पर 'साधना' (प्रतर्याग) सभव है। यह तो कार बाहल्य के प्रति एक तीखी प्रतिक्रिया और मतर्याग के ही कहा जा च का है कि द्वयात्मक प्रद्वय सत्ता विश्वात्मक प्रति लगाव का सत सवादी विद्रोही स्वर कतिपय रचनामो भी है और विश्वातीत भी। विश्वात्मक रूप में उसके में विद्यमान है । पाहुड़, दोहा, योगसार, परमात्म प्रकाश, अवरोहण की एक विशिष्ट प्रक्रिया है और उमी प्रकार वैराग्यसार, प्रानन्दा, सावय घम्म दोहा मादि रचनाए प्रारोहण की भी। विचार पक्ष से जहां प्रागमो ने द्वया- ऐसी ही है। इनमें संतसंवादी मनःस्थिति का प्रभाव या स्मक अद्वय तत्व की बात की है वही प्राचार पक्ष से प्रतिबिम्बस्पष्ट दिखाई पड़ता है। जिस प्रकार अन्य रहस्यवासना (काषाय) दमन की जगह वासना शोधन की बात वादी रचयितानों ने क्रमागत रूढियों एवम् बाह्याचारों भी। जैनधारा न तो 'द्वयात्मक प्रदय' की बात स्वीकार का खण्डन करते हुए पारमाथिक तत्त्वों की उपलब्धि के करती है और न ही वासना के शोघन चिन्मयोकरण को, अनुरूप यत्नों और दिशानों को महत्त्व दिया है-यही जबकि 'सत' जन विचार और प्राचार दोनों पक्षो में स्थिति इन जैन मुनियों की भी है। लगता है कि इस 'मागम' धारा को मानते है। मौजी श्रीर मौज, सुरत मोर अवधि में प्राचार या साधन को ही साध्यता की कोटि शब्द के 'योग' अथवा 'सामरस्य' में जहा सत जन 'द्व या- प्राप्त होती जा रही थी-फलतः कट्टर साम्प्रदायिक त्मक प्रय' को स्वीकार करते है, वहा काम मिलावे राम । लकीरों और रेखामों के प्रति इनके मन में भी उप को' द्वारा प्रेम की महत्ता का गान करते हुए तन्मय प. प्राक्रोश था और उस अझलाहट को वे उसी उग्र स्वर में मात्मा की उपलब्धि में वामन। के शोधन और चिन्मयीकरण व्यक्त करते है जिस स्वर में सिद्धो नाथों भौर निगुकी भी स्थिति स्वीकार करते है। प्रागम सम्मत संत नियो ने माक्रोश-गर्म उद्गार व्यक्त किए थे। प्रो० हीरा परम्परा से जैन धारा का एक तीसरा अन्तर यह भी है लाल जैन ने ठीक लिखा है कि "इन दोहों में कि जहा पहला अद्वयवादी है वहा दूसरा भेदवादी। वह जोगियों का अगम, प्रचित्-चिन्, देह, देवली, शिवशक्ति न केवल अनेक प्रात्मा की ही बात करता है अपितु ससार संकल्प-विकल्प, सगुण-निर्गुण, अक्षरबोध विधि, वाम ससार को भी प्रनादि और शाश्वत सत्य मानता है। इस बक्षिण अध्व, दो पथ रवि-शशि, पवन, काल प्रादि ऐसे प्रकार, ऐसे अनेक भेदक तत्व उभरकर सामने प्राते है शब्द है और उनका ऐसे गहन रूप में प्रयोग हुप्रा है कि जिनके कारण 'सत' साहित्य के सदर्भ में जन साहित्य को उनमे हमे योग और तांत्रिक ग्रथों का स्मरण हुए बिना

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