Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 61
________________ प्राकृत का दाव्य संग्रह और उसकी महत्ता झठलाने का उसे कोई अधिकार भी नहीं हैं, क्योकि वस्तु वस्तु को द्रव्य की मुख्यता से जानने या कथन करने को के भनेकातात्मक होने से दूसरा नय भी तो उसी वस्तु मे द्रव्याथिक नय कहते हैं। पर्यायों या गुणों को वस्तु के अंश विद्यमान उससे भिन्न दूसरे सत्याश को ही ग्रहण व प्रति- या भेद रूप में ग्रहण कर जानने वा कथन करने को पादन कर रहा होता है। पर्यायाथिक नय कहते हैं। नैगमसग्रहादि इन्ही नयों के भेद प्रतः किसी भी नय का पक्षपाती बनकर दुराग्रह करना हैं। अध्यात्म ग्रन्थों में इन्हीं नयों का निश्चय पोर व्यवहार न तो उचित है और न वह जिनागम के अनुकूल है। हो नय के नाम से प्रतिपादन एव प्रयोग किया गया हैसकता है कि किसी को किसी नय विशेष से अधिक प्यार द्रव्याथिक को निश्चय व पर्यायाथिक को व्यवहार । इनमे और उसी को परम सत्य मानने का भ्रम हो गया हो, निश्चय नय को प्रायः भूतार्थ और व्यवहार नय को प्रभूतार्थ किन्तु ऐसे मोही जन ही एकांत मिथ्यात्वी कहे जाते है, यह कहा गया है। हमें सदैव ध्यान में रखना है। भूतार्थ शब्द-भूत+अर्थ, इस प्रकार दो शब्दों के योग ___इसीलिए वक्ता और श्रोता दोनो को नयों के स्वरूप से बना है। भूत शब्द के अनेक अर्थ हैं-हित, सत्य, द्रव्य, को भलीभांति समझकर ही निष्पक्ष भाव से वस्तु तत्त्व जीव, प्रेतियोनि, अतीतकाल, मूलतत्त्व प्रादि । इसी प्रकार, जानना व अन्य को प्रतिपादन करना स्व पर हिन उपा- अर्थ शब्द भी अनेक अर्थों में प्रयुक्त होता है, जैसे-प्रयोजन, देय व उचित है; क्योकि शास्त्र की गादी पर वक्ता जैन अभिप्राय, धन, हेतु, विषय प्रादि । यहा किस अर्थ में भूत सिद्धात का प्रतिपादक होता है, न कि अपनी निजी का अर्थ शब्द का प्रयोग किया गया है, यदि इसपर विचार संकुचित एव कल्पित मान्यताओं और पक्षपातपूर्ण एकातिक करें तो प्रकरण को देखते हुए भूत शब्द द्रव्यवाचक एवं रुचि व विचारधारा का। अर्थ शब्द विषय या प्रयोजन वाचक सुसगत प्रतीत होता है। तदनुसार द्रव्य (सामान्य) है। प्रयोजन या विषय जिसका प्रमाण और नय वह भूतार्थ नय है और जिसका विषय द्रव्य नही है"प्रमाणनयरधिगम." मोक्षशास्त्र के इस सूत्र के अन पर्यायादि विशेष हैं, वह अभूतार्थ नय है । यतः शुद्ध निश्चय सार वस्तु तत्त्व का ज्ञान प्रमाण और नयों से होता है. नय (अपर नाम द्रव्याथिक नय) पर्यायादि भेदो को गौण अर्थात् प्रमाण और नय वस्तु स्वरूप को जानने के साधन कर द्रव्य (सामान्य व अभेद) दृष्टिप्रधान है, अत: वह है। अनेकातमयी वस्तु के सर्वांग ज्ञान को प्रमाण तथा भूतार्थ है तथा व्यवहार नय द्रव्य को गौण कर पर्याय उसके किसी अश की मुख्यता को लेकर एकागी ज्ञान या (विशेष) दृष्टि प्रधान है अत. प्रभूतार्थ है। उसके प्रगट करने के अभिप्राय को नय कहते है। प्रत्येक भूत शब्द का अर्थ सत्य भी है जिससे निश्चय नय को वस्तु अनेकातात्मक-अपने अनंत गुणो और पर्यायों का सत्यार्थ एव व्यवहार नय को असत्यार्थ भी कहा गया हैप्रखड पिड है। प्रत. उसको प्रमाण द्वारा वैसा ही जानकर जिसका उल्लेख श्रीमज्जयसेनाचार्य कृत समयसार की उसमे विद्यमान एक गुण, धर्म या पर्याय को मुख्य तथा शेष ११वी गाथा की टीका में पाया जाता है। किन्तु इसी को गौणकर कथन करने को स्याद्वाद कहा जाता है। प्रमाण ११वी गाथा को टीका मे उक्त प्राचार्य ही गाथा का के प्रत्यक्ष-परोक्ष के भेद से दो भेद हैं । इन्द्रियों और मन द्वितीय रूप में व्याख्यान करते हुए व्यवहार नय को भी आदि पर वस्तु की सहायता से होने वाला ज्ञान परोक्ष भूतार्थ और अभूतार्थ के भेद से दो भागों में विभक्त करते प्रमाण है तथा बिना किसी की सहायता के अात्मिक शक्ति है। वे लिखते है कि व्यवहार नय भूतार्थ और अभूतार्थ के प्रद होनेवाला ज्ञान प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है। भेद से दो भेद रूप हैं, उसी प्रकार शुद्ध नय भी भूतार्थ और नय के भी मुख्य दो भेद हैं-(१) द्रव्याथिक अभूतार्थ (शुद्ध निश्चय और अशुद्ध निश्चय) के भेद से दो (२)पर्याथिक । द्रव्य-गुण-पर्याय के प्रखंड पिंड स्वरूप भेद रूप हैं । उनके शब्द हैं

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