Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 70
________________ बुद्ध और महावीर • देवसहाय त्रिवेद अभी तक लोग मानते रहे है कि नातपुत्र-ज्ञातृपुत्र महावीर का सुधार सम्प्रदाय पंचयाम धर्म के नाम से भगवान् बुद्ध के समकालिक थे क्योंकि सामान्यतः सभी स्यात है। चातुर्याम धर्म हैं-अहिंसा, सत्य, अस्तेय, मान लेते हैं कि ज्ञातृपुत्र ही महावीर वर्द्धमान है तथा अपरिग्रह जिनमे महावीर ने ब्रह्मचर्य जोड़कर पंचयाम निगंठ, निग्रंथ (बिना बंधन के) बौद्ध संघ की स्थापना धर्म की संज्ञा दी। के पूर्व भी एक महान सम्प्रदाय के रूप में विद्यमान थे। गोत्र-बौद्धों के अनुसार नातपुत्र का गोत्र था अग्निपाश्चात्य विद्वानों ने तो प्रारम्भ में भगवान् बुद्ध व महा- वेसान-पग्निवेश्यायन, किन्तु जैनो के अनुसार महावीर वीर को एक ही समझ लिया था। किन्तु अब यह शका का गोत्र या काश्यप । प्रतः तीर्थकर के गोत्र के विषय में प्रबल होती जा रही है कि क्या ये दोनों महापुरुष बद्ध हमे जैन परम्परा को ही श्रेय मानना चाहिए । बौद्ध प्रयों व महावीर समकालिक थे ? मे प्राय: निग्रंठ नाथपुत्र की चर्चा है तथा कभी-कभी नातनिगंठ-समगामसुत्त के अनुसार जब भगवान बद्ध पुत्र का भी उल्लेख मिलता है। किन्तु जैन परम्परा के शाक्य प्रदेश के सामगाम मे डेरा डाले थे, निगठ नाथपूत्र अनुसार महावीर का जन्म ज्ञातृकुल मे हुमा पा। इलाहाकी मृत्यु का समाचार एक शिष्य ने मानन्द को सुनाया। बाद विश्वविद्यालय के साक्टर बाबूराम सक्सेना अपने पत्र प्रचलित माम्य परम्परा के अनुसार भगवान बुद्ध व महा- ५ सितम्बर १९४० में कहते हैं-ज्ञात या ज्ञाति का रूप वीर की निर्वाण तिथि हैं--५२७ ख० पू० तथा ५४३ नय, नाइ, जाय या जाइ हो सकता है किन्तु नाथ का रूप खु० पू० (सिंहल)। प्रतः स्वयं बुद्ध गौतम भगवान ही नाय या नाइ नहीं हो सकता । नाथ का प्राकृत रूप होगा तीर्थकर महावीर निर्वाण के १६ वर्ष पूर्व ही (५४३- नाह या णाह। महाप्राण प्रक्षर मेरी समझ मे अबतक ५२७) चल बसे थे। मज्झिमनिकाय का उपालिसूत्त इतने विकृत नही हुए हैं। नाय का 'या' किसी व्य जन के कहता है कि निगंठ नाथपुत्र भगवान बद्ध की प्रशसा न लोप का द्योतक है। सह सके प्रतः उनके मुख से लाल रक्त टपकने लगा। चेटक-बौद्ध ग्रन्थों मे वैशाली के राजा सिंह का अत: यह मानना होगा कि निगंठ नाथपुत्र का निधन बुद्ध उल्लेख है किन्तु जैन ग्रन्थों मे वैशाली का राजा है चेटक। निर्वाण के बहुत पहले ही हो गया था। वैशाली जनों का गढ़ था। बौद इसे घृणा की दृष्टि से चातुर्याम - यह शंकास्पद है कि बुद्ध-महावीर प्रायः देखते थे, क्योकि यह प्रनास्तिकों व विद्रोहियों का अड्डा समकालिक थे जैसा कि लोग अभी तक मानते पा रहे है। था। बौद्धो के अनुसार वैशाली का शासन राजा, उपराज किन्तु इतना निश्चित है कि निगठ नाथपुत्र का निधन व सेनापति की सहायता से सध के द्वारा करता था किन्तु बुर निर्वाण से पूर्व हुमा । स्यात् यह निगंठ नाथपुत्र महा. जनों के निरयावली-सुत्त के अनुसार, काशी व कोसल में वीर का कोई पूर्ववर्ती जैन महंत था। दीघनिकाय में १८ गणराज्य थे । इनके सिवाय लिच्छवी, मल्लकी तथा निगठ नाथपुत्र के चातुर्याम सवर सवृत्तों का उल्लेख है। वैशाली के राजा थे चेटक । पाली चातुर्याम का प्राकृतरूप है चतुज्जाम जो तीर्थकर दो महान समाज सुधारक एक ही काल तथा क्षेत्र में महावीर के सभी पूर्ववर्ती सिद्धान्तों पर लाग होता है। अपने सिद्धान्त का प्रचार करें तथा वेद-ब्राह्मण धर्म को १. (क) भारत का नया इतिहास, पुणे १९७८, पृ० १.। (ख) भारतीय विद्या, बम्बई, भाग ८, पृ० २३४ ।

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