Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 80
________________ ७२, बर्ष ३२, कि० ३.४ स्वप्रपेक्षा का कथन स्वयंसिद्ध होता है, इसलिए ऐसा इस प्रकार सिद्ध हुआ कि उपचरित कथन मुख्य कथन कथन उत्पत्ति मार्ग तथा शप्ति मार्ग दोनों का ज्ञान कराने के अर्थभूत पदार्थ का ज्ञान करने में निमित्त है, न कि मुख्य वाला होता है तथा पर-प्रपेक्षा का कथन निमित्त तथा कयन के प्रथमत पदार्थ के उत्पन्न होने में। प्रयोजन के प्राधार पर सिद्ध होता है इसपिये यह कथन पदार्थ प्रतिपादन रूप शब्द, पदार्थ, पदार्थ का ज्ञान मात्र ज्ञाप्तिमार्ग अर्थात ज्ञान कराने वाला कथन है। इन्हीं क्रमशः शब्दनय, अर्थनय तथा ज्ञाननय के विषय हैं। दोनों प्रकार के कथन को प्रध्यात्म कयन-प्रागम कथन, शब्द में ज्ञान का उपचार याने व्यवहार किया जाता है तथा निश्चय कथन-व्यवहार कथन नाम से भी कहा जाता तथा ज्ञान स्वय ज्ञानरूप है ही; इसलिये पदार्थ धर्थात् पर्थ है तथा यही अपेक्षा भिन्नता ज्ञान के अनेकान्त स्वरूप को नय को समझने के लिये शब्द द्वारा जो भी कथन या वचन समझाने के लिये स्यानाद नाम से प्रसिद्ध है। रूप में व्यवहार होता है, वह सब शब्दनय का विषय है तथा किसी भी कथन की विवेचना करते समय पहले कथन शब्द द्वारा पदार्थ का जो ज्ञान होता है वह ज्ञाननय का को भली प्रकार समझना जरूरी है कि इस कथन का विषय है। इस प्रकार से पदार्थ को जानने का मार्ग ही ज्ञप्ति शब्दार्थ, नयार्थ मतार्थ पागमार्थ तथा भावार्थ क्या है ? मार्ग, मागम मार्ग, व्यवहार मार्ग कहलाता है । इस मार्ग मुख्य कथन तो स्वयसिद्ध होने के कारण, उसकी । के द्वारा मात्र पदार्थ के कथन का ज्ञान होता है, स्वय पदार्थ समझ में तो विशेष बाधा नही पाती है लेकिन उपचरित नही हुमा करता। लेकिन मूल में भूल वश इस ज्ञप्तिमार्ग कथन में उपचरित कथन के लक्षण का ध्यान नहीं रखने द्वारा पदार्थ का होना मान लिया जाता है याने ज्ञप्तिमार्ग के कारण अन्यथा समझ अपना ली जाती है। इस विपरीत से पदार्थ की उत्पत्ति मान लेते है। इस कारण विपरीतता ममझ के कारण उपचरित कथन मे मिथ्यापन का प्रारोप की विपरीत मान्यता के कारण अनादिकाल मे जीव को मा जाता है क्योंकि उपचरित कथन का मुख्य रूप से अपने मात्मस्वभाव की सम्यक् प्रतीति नही हो पा रही है प्रतिपादन करना या समझना ही विपरीत याने मिथ्या है। जिसके फलस्वरूप इष्ट पनिष्ट कल्पना तथा रागद्वेष रूप उपचरित कथन स्वयं ही यह घोषित करता है कि मैं मख्य परिणमन का अभिप्राय निरन्तर मिथ्यात्त्व एवं अनंतानुबंधी कथन नही हैं। मुख्य को समझने के लिये ही मेरे में मुख्य कषाय के रूप में प्रतिफलित हो रहा है। का उपचार किया गया है, इसीलिए उपचरित कथन स्वय पदार्थ की उत्पत्ति उपादान कारण से भी और निमित्त सिद्ध नही होकर निमित्त एवं प्रयोजन के प्राधार पर ही कारण से भी याने दोनो कारणों से उत्पत्ति मानना ही तो सिद्ध होता है। उपचरित कथन कहो या निमित्त नमैतिक सम्बन्ध मिथ्या अनेकान्त है । जबकि उपादान कारण भिन्न अपेक्षा कहो, एक ही बात है। उपचरित क्थन का लक्षण निमित्त याने उत्पत्ति की अपेक्षा से कारण है तथा निमित्त कारण नैमित्तिक सम्बन्ध को सिद्ध करने वाला है। जब उपरित याने उपचरित कारण भिन्न प्रपेक्षा ज्ञप्ति याने जानने की कथन निमित्त रूप में माना जावे तो उपचरित कपन का अपेक्षा से कारण है तथा यह अपेक्षा-भिन्नता ही सम्यक लक्ष्य या प्रयोजन नमित्तिक माना जाता है तथा उपचरित अनेकान्त है। कथन का लक्ष्य या प्रयोजन जब निमित्त रूप से प्रतिपादित इसी अनेकान्त स्वरूप को समझने के लिये ही समय होता है तो वही उपचरित कथन मुख्य रूप होकर नैमित्तिक सार गाथा १२ की टीका में श्रीमद् प्राचार्य देव ने जो कहलाता है। इस तरह से सभी उपचरित कथन निमित्त मार्मिक चेतावनी दी है, उसका सही भाव समझना भी नैमित्तिक सम्बन्धको लियेहए है। इसलिए उपचरित कथन अपक्षित है। तथा उसका लक्ष्य प्रापस मे एक दूसरे की अपेक्षा निमित्त जह जिणमय हवज्जह ता मा ववहार णिच्छए मयह । रूप भी है तथा नैमित्तिक रूप भी है। ए एण विणा छिज्जा तिस्थ प्रणेण उण तच्चं ।

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