Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 74
________________ ६६, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकान्त मोर स्पर्श के सयोग से अग्नि की; रस, शब्द, स्पर्श और द्रव्य ऐसे हैं, जो सक्रिय है। पात्मा (पुरुष) शुद्ध है, उसका रूप तम्मात्रामों के योग से जल की; और पांचों तन्मात्रामों परिणमन अपने स्वरूप में होता है। कर्म पुद्गलों (प्रकृति) के संयोग से पृथ्वी की उत्पत्ति होती है । इसलिए इन पांचों से संबद्ध होने के कारण वह ससार में परिभ्रमण करता है। महाभूतों के गुण भी क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस और यह सत्य है कि कर्म-पुद्गल एव उनसे बने योगों से ही नये गध है। कर्मों का पागमन होता है। कर्म पुद्गल ही पुद्गलों को विकास के दो रूप : प्रकृति का विकास एवं फैलाव प्राषित करते है। परन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि दो रूपों में होता है-बुद्धि-सर्ग मोर भौतिक मर्ग । प्रथम प्रचेतन होने के कारण जड़-पुदगल (प्रकृति) स्वत: कुछ अवस्था मे बुद्धि, प्रहकार और मन प्रादि एकादश इन्द्रियों नहीं कर पाते। योगो मे स्पन्दन तभी तक होता है, की उत्पत्ति होती है। उसके पश्चात् तन्मात्रामो एव महाभूतों जब तक वे प्रात्मा से सबद्ध है और उन योगों से प्रागत कर्मकी उत्पत्ति होती है, जिसे भौतिक तत्त्व कहते है। पांच पुद्गलो का बन्ध जो होता है वह योगों से नही, परिणामों महाभूतों की उत्पत्ति के साथ ही सष्टि-निर्माण का कार्य एवं भावना से होता है। परिणाम (भाव) पास्मा के है। पूरा हो जाता है, इस प्रकार प्रकृति से मष्टि साकार रूप भले ही वे शुद्ध भाव (स्वभाव) नहीं है, अशुद्ध-भाव लेती है और वह विलोन भी प्रकृति में होती है। साख्य. (विभाव) है । परन्तु है प्रात्मा के हो। इसलिए इस अपेक्षा दर्शन के अनुसार मसार का सारा खेल प्रकृति का है, पुरुष से जैन-दर्शन संसारी प्रात्मा को कर्मा भी मानता है, केवल उसमे कुछ नही करता है। वह केवल इस खेल का द्रष्टा एवं भोक्ता है। भोक्ता नही। वह अपने प्राबद्ध कर्मों का कर्ता भी है, प्रकृति अचेतन है, जड़ है। परन्तु वह चेतन पुरुष से भोक्ता भी है और उनकी निर्जरा करके उनसे मुक्त होने सबद्ध होने के कारण क्रिया उसी मे होती है। पुरुष शुद्ध वाला भी वही है। इस तरह सृष्टि के निर्माण में दोनों में है, उसमे क्रिया नही होती, इसलिए उसे बन्ध भी नही यह ममानना भी है कि पुरुष (प्रात्मा) एव प्रकृति (कम. होता। कर्म, सुख-दुख, शुभ-अशुभ सब प्रकृति के धर्म है. पुद्गल) के सयोग से ही संसार गतिशील) है। इमलिए प्रकृति म ही होते है। पुरुष को फल का भोग इस. जैन-दर्शन पास्मा पुरुष) को ज्ञान स्वरूप मानता है लिए मिलता है कि वह भोक्ता है; जैसे राजा के मामने नतंकी और साख्य-दर्शन उसे (बुद्धि को, ज्ञान को) प्रकृति से नत्य करती है । नत्य की क्रिया गजा नहो करता, वह तो उत्पन्न मानता है। वह भी जैन-दर्शन की तरह ज्ञान के केवल द्रप्टा बनकर देवता है और उम नत्य का प्रानन्द शुद्ध-अशुद्ध दोनो रूप मानता है, परन्तु उसे पुरुष का लेना है। इसी प्रकार प्रकृति नृत्य करने वालो नर्तकी है स्वभाव नहीं मानता और वस्तु स्थिति यह है कि ज्ञान को और पुरुष इस ममार के इस नत्य का द्रष्टा एवं भोका प्रात्मा से पृथक किया नहीं जा सकता। वह तब भी मात्मा प्रर्थात् मानन्द लेने वाला, भोग करने वाला है। अचेतन में रहना है, जब कि मुक्त अवस्था में प्रकृति (कर्म एव प्रकृति सक्रिय कैसे होती है ? इसके लिए मांस्य-दर्शन में कमजन्य माधन) नहीं रहती।। बताया है कि गाय के सामने जब बछड़ा ग्राना है। नब मांख्य-दर्शन प्रकृति को परिणामी मानता है और उसके स्तनो में दूध की धारा स्वतः ही प्रवहमान हो जातो पुरुष को प्रपरिणामो। परन्तु जैन-दर्शन प्रकृति (पुदगल) है। इसी प्रकार पुरुष का विम्ब पड़ने सही प्रकृति में की तरह पुरुष (प्रात्मा) को भी परिणामी नित्य मानता सक्रियता प्रा जानी है और वह सष्टि- निर्माण के कार्य में है। पात्मा का परिणमन अपने स्वभाव मे एवं अपने स्वरूप सक्रिय हो जाती है। में होता है। लोक मे स्थित छहो द्रव्य-धर्म, अधर्म, पाकाश, सारूप-दर्शन जन-दर्शन के काफी निकट है। जैन-दर्शन काल, पुद्गल एव जीव अपने-अपने गुणों मे परिणमन करते भी ईश्वर का सृष्टि का कर्ता स्वीकार नहीं करता। मृष्टि है। प्रत्येक द्रव्य अनन्त गुणों एवं पर्यायों से युक्त होता है। मनादि-अनन्त है। उसका निर्माता कोई ईश्वर नही है। प्रतः द्रव्य की अपेक्षा से नित्य रहते हुए उसकी पर्यायों में इस बात को जन-दर्शन भी स्वीकार करता है कि प्रात्मा परिण मन होता है। परिणमन से उमकी नित्यता मे कोई स्वरूप की दृष्टि से शुद्ध है । मात्मा और पुद्गल-दो ही बाधा उपस्थित नहीं होती।

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