Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

View full book text
Previous | Next

Page 75
________________ जैन धर्म की प्रासंगिकता 0 डा० निजामुद्दीन ["भनेकान्तवादी समन्वयवादी होता है, वह परस्पर-विरोधी मतों, विचारधारामों में सहिष्णुता की मिठास घोल कर उनकी कटुतामों को नष्ट कर उन्हे सर्वग्राही बनाता है। जैनधर्म का यह सिद्धान्त प्राज के संघर्षा कूल युग के लिए बहुत ही प्रावश्यक एवं उगदेय है। इसकी शरण में पाकर साप्रदायिक और राजनीतिक समी प्रकार के संघर्षद्वन्द्व समाप्त हो जाते हैं । प्राधुनिक बौद्धिक एवं ताकिक युग मे पनाग्रह दृष्टि बनाता है। जैन धर्म का यह सिद्धान्त प्राज के संघर्षा कुल द्वारा ही सत्याग्वेषण किया जा सकता है। प्राग्रहजन्य युग के लिए बहुत ही भावश्यक और उपादेय है। इसकी मात्यन्तिक दृष्टि मिथ्यावाद की धुन्ध मे लिपट कर मनुष्य शरण में पाकर साप्रदायिक और राजनीतिक सभी प्रकार को अपने धर्म से विचलित कर देती है। उसकी वह दृष्टि के संघर्ष-द्वन्द्व समाप्त हो जाते है। विश्व की सबसे दूसरों को तो भली प्रकार देख नही पाती, स्वयं को भी बड़ी शान्ति स्थापित करने वाली सस्था यू०एन० प्रो. नही देख पाती। एक मन्तुलित एव मम्यक दृष्टि जब अपने मिशन मे प्रमफल हुई तो इम कारण ही कि प्राप्त कर हम दूसरों को, अपने को, देखकर ज्ञान-लोक में सदस्य देश सकीर्ण विचार धारा मे बाहर नही निकल उतर सकते है। जैनधर्म की प्रासगिकता इस दृष्टि से स्वय- सके, वे एक-दूसरे के प्रति सहिष्ण नहीं बन सके. सिद्ध है कि उसका अनेकान्तवाद का मिद्धान्त सभी प्रकार उनके विचार-तन्तु ममन्वयात्मक दृष्टि मे से उद्भूत नहीं के दुराग्रहो की घन्ध को विच्छिन्न करता है और एक थे, वे अनेकान्तवाड़ी नहीं थे। अपने ही देश में गजनीतिक सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण को पल्लवित करता है, समतामय उथल-पुथल पर दृष्टि डालकर देखिये तो यहाँ भी विचारधारा को विकसित करता है। आज समाज मे, देश अनेकान्त-रहित दृष्टि ही प्रमख कारण है। जैनधर्म तो मे, विश्व मे विचारो का संघर्ष है। सभी अपने-अपने दष्टि- एकत्व और भनेकत्व दोनों को सत्य मानकर अगीकार कोण को मूल्यवान समझकर दूसरों के दप्टिकोण को करता है । जैनधर्म में भगवान महावीर ने मामाजिक और अवहेलित तथा खण्डित करते है । दूसरो की बात को, मन राजनीतिक, प्रार्थिक और साम्प्रदायिक मभी प्रकार की समस्याओं का अहिंसात्मक समाधान अनेकान्तवाद द्वारा को सहानुभूति और महिष्णुता के साथ न सुनना पारम्परिक प्रस्तुत किया है, जिसकी उपयोगिता प्राज अधिक तीव्रता सघर्ष को हवा देना है। हमारे देश मे माप्रदायिक दगो की मे अनुभव की जा रही है। विभीषिका देश को प्राक्रान्त किये है। सिक्खो के जत्थों में जैनधर्म की प्रामगिकता पर विचार करते हए कई बार खून-खराबा हो चुका है। पिछले कुछ महीनो में सामाजिक एकता को सामने रखना होगा। प्राज हमारा हिन्दू-मुसलमानो के दंगों में मनुष्य-जाति का अनमोल रक्त समाज न जाने कितनी जातियो-उपजातियों में विभक्त है बहाया गया, हिंसा का क्रूरतम रूप कभी सभल, कभी और उस पर तुर्रा यह कि ये जातियाँ-उपजानियाँ ऊँच-नोच की हीनता की ग्रन्थि मे इतनी बुरी तरह फैपी है कि जो अलीगढ़, कभी जमशेदपुर प्रादि में देखा गया। बेचारे नीच घोषित कर दी गयो वह बम प्रलय काल तक -सृष्टि असख्य हरिजनों को धधकती ग्राम में जीवित झोका गया। के अन्त तक-नीच ही बनी रहेगी। हरिजनो का ही ये हृदयविदारक घटनाएं केवल इसलिए हई कि लोगों में लीजिये; मंविधान में समानता के अधिकार की घोशणा वैचारिक सहिष्णुता नही, पनाग्रह दष्टि नही, सर्वधर्म-सम की गयो, फिर भी शामन को, सरकार को हरिजनों को र भावका उदारवादी दृष्टिकोण नही, जो जैनधर्म के अनेकान्त- संविधा के लिए. उनके जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए बाद मे पभिनिहित है। अनेकाम्तवादी संघर्षवादी नही हो विशेषाधिकारो की घोषणा करनी पड़ी; परन्तु इन सकता, अनेकान्तवादी दुराग्रह द्वारा अपने मत को सर्वोत्तम विशेषाधिकारी को भोग कर अपना जीवन स्तर ऊपर नहीं कह सकता । अनेकान्तवादी समन्वयवादी होता है, वह उठाने वाले क्या समाज में समादत है ? नहीं। बाबू परस्पर विरोधी मतों, विचार-धारामो में सहिष्णुता को जगजीवन राम हमेशा से मन्त्री पद पर रहे हैं, परन्तु माम मिठास घोलकर उनकी कटुता को नष्ट कर सर्वग्राही लोगो ने इन्हे 'हरिजन' ही समभा। जैनधर्म में इस प्रकार

Loading...

Page Navigation
1 ... 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83