Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 67
________________ जैनाचार्य और आयुर्वेद [जनाचार्यों ने भी अन्य भाचार्यों की भांति प्रायुर्वेद साहित्य के सजन ये अपना अपूर्व योगदान किया है। भावश्यकता इस बात की है कि अनुसन्धान द्वारा उम साहित्य को प्रकाश मे लाकर मायुर्वेद-साहित्य की वृद्धि की जाए और प्रायुर्वेद की दृष्टि से उसका समुचित मूल्यांकन किया जाए।] 0 श्री राजकुमार जैन संस्कृत-साहित्य की श्रीवृद्धि मे जैनाचार्यों ने अपना प्राश्चर्य होता है कि किस प्रकार उन्होंने अनेक विषयों पर जो महत्त्वपूर्ण योगदान किया है, वह सुविदित है । सस्कृत- अपनी अधिकारपूर्ण लेखनी चलाकर अपनी अद्भुत विषयसाहित्य का ऐसा कोई विषय या क्षेत्र नही बचा है जिस प्रवणता और विलक्षण बुद्धि-वैभव का परिचय दिया है। पर जैनाचार्यों ने अपनी लेखनी न चलायी हो। इसका इससे यह भी स्पष्ट होता है कि उन्हे उन सभी विषयों में मुख्य कारण यह है कि जैनाचार्य केवल एक विषय के प्रौढ प्रभुत्व प्राप्त था। उनका पाण्डित्य सर्वपदगत व्यापी अधिकारी नहीं थे, अपितु वे प्रत्येक विषय में निष्णात थे; था और उनका ज्ञान-रवि अपनी प्रखर रश्मियो से सम्पूर्ण अतः उनके विषय में यह कहना सम्भव नही है कि उनका साहित्य-जगत् को पालोकित कर रहा था। अधिकृत विषय कौन-सा है? जैनाचार्यों ने जिस प्रकार काव्य, अलंकार, कोश, छन्द, न्याय, दर्शन व धर्मशास्त्रों का प्रायुर्वेद-साहित्य के प्रति जैनाचार्यों द्वारा की गयी निर्माण किया था, उसी प्रकार ज्योतिष और वैद्यक विषय सेवा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है, जितनी अन्य साहित्य के भी उनकी लेखनी से पछते नही रहे। अनेक उपलब्ध प्रति; किन्तु दुख इस बात का है कि जैनाचार्यों ने जितना प्रमाणो से पब यह स्पष्ट हो चका है कि जैनाचार्यों ने वैद्यक साहित्य निर्मित किया है वह अभी तक प्रकाशित नहीं प्रचुर मात्रा मे स्वतन्त्र रूप से वैद्यक ग्रन्थो का निर्माण कर किया जा सका है। यही कारण है कि वर्तमान में उनके मायुर्वेद साहित्य को वृद्धि मे अपना प्रभूतपूर्व योग दिया द्वारा लिखित अनेक वैद्यक ग्रन्थ या तो लुप्त हो गये हैं है। इस मम्बन्ध मे एक लम्बी सूची प्राप्त हुई है, जिससे अथवा खण्डिन रूप में होने से अपूर्ण है। काल-कवलित जैनाचार्यों द्वारा लिखित वैद्यक सम्बन्धी कृतियो का संकेत हुए अनेक वैद्यक प्रन्थो का उल्लेख विभिन्न प्राचार्यों की मिलता है । इनमे से कुछ कृतियाँ मूलरूप से संस्कृत भाषा वर्तमान में उपलब्ध पन्यान्य कृतियों में मिलता है। विभिन्न मे लिपिबद्ध हैं और कुछ हिन्दी मे पद्य रूप मे । जैन भण्डारों या मन्दिरो मे खोजने पर अनेक वैद्यक प्रन्यों के प्राप्त होने की सम्भावना है। प्रत: विद्वानों द्वारा इस जिन जैनाचार्यों ने धर्म-दर्शन-न्याय-काव्य-प्रलंकार दिशा मे प्रयत्न किया जाना अपेक्षित है। सम्भव है कि इन मादि विषयो को अधिकृत कर विभिन्न ग्रन्थों का प्रणयन वैद्यक ग्रन्थों के प्रकाश में प्राने से मायुर्वेद के उन महत्त्वकिया है, उन्ही प्राचार्यों ने वैद्यक शास्त्र का निर्माण कर पूर्ण तथ्यों और सिद्धान्तो का प्रकाशन हो सके जो प्रायुर्वेद अपनी मलौकिक प्रतिभा का परिचय दिया है। पूज्यपाद के प्रचुर साहित्य के काल कवलित हो जाने से विलुप्त हो स्वामी, स्वामी समन्तभद्र, प्राचार्य जिनसेन, गुरु वीरसेन, गये है। जैनाचार्यों द्वारा लिखित वंद्यक प्रन्थो के प्रकाशन गुणसागर श्री गुणभद्र, महर्षि सोमदेव, सिद्धवर्णी रत्नाकर से प्रायुर्वेद के विलुप्त साहित्य और इतिहास पर भी प्रकाश तथा महापण्डित पाशापर मादि जैनाचार्यों की विभिन्न पड़ने की पूरी सम्भावना है। कृतियों पर जब हम दृष्टिपात करते है तब यह देखकर बड़ा वर्तमान में केवल एक ही ऐसा वैयक ग्रन्थ उपलब्ध है

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