Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 62
________________ ५४, वर्ष ३२, कि० ३-४ अनेकांत "द्वितीय व्याख्यानेन पुनः ववहारो प्रभूदत्थो- जैन सिद्धांत में नयो को अश-अंग रूप मे बस्तु का परिज्ञान व्यवहारोऽभूतार्थो भूदन्थो भूतार्थश्च देसिदो देशितः कथितः करानेवाला होने से उनको परस्पर मैत्री-भाव (अन्य नय न केवलं व्यवहारो देशितः, सुद्धणयो शुद्ध निश्चय नयोऽपि । सापेक्षता) रखकर ही वस्तु के सत्यांश का प्रतिपादक माना दु शब्दादय शुद्ध निश्चय नयो पि द्विधा शुद्धनिश्चया- गया है। शुद्धनिश्चयभेदेन निश्चय नयोऽपि द्विधा इति न य चतुष्टयं । भूत शब्द का अर्थ हित भी है, अतः इस दृष्टि से कोई -समयसार, रामचन्द्र शास्त्रमाला, पृष्ठ २४। कोई मनीषी केवल निश्चय नय को ही प्रात्मा का हित श्रीमदमतचन्द्र स्वामी ने भी समयसार की १४वी साधक मान निश्चय को भूतार्थ व व्यवहार नय को अहितगाथा की टीका में व्यवहाग्नय की दृष्टि प्रधान कथन को कारी मान उसे अभूतार्थ व सर्वथा हेय प्रतिपादन करते देखे कथंचित भूतार्थ कहा है और उसी प्रकार शुद्ध निश्चय नय जाते है। किन्त शिष्यों को तत्त्व बोध कराने में व्यवहार नय की दृष्टि प्रधान कथन को भी कचित् ही भूतार्थ कहा है। ही प्रयोजनबान होने से, हितकारी भी सिद्ध होता है; वे कहते है-मात्मा का प्रबद्ध, अस्पष्ट, अनन्य, नियत, यहा तक कि सभी जीवों को प्रारभिक अज्ञान दशा में प्रविशेष और प्रसयुक्तपना शुद्ध निश्चय नय की दृष्टि से व्यवहार नय ही तत्त्व बोध करने में अनिवार्प साधन है अतः विचारने पर भूतार्थ है और व्यवहार न य की दृष्टि से देखने इस अर्थ में भी व्यवहार नय भूतार्थ सिद्ध होता है। पर बद्ध, स्पष्ट, अन्य, अनियत, मविशेष तथा सयुक्तपना इस प्रकार, ममयमार में श्रीमदमतचन्द्राचार्य ने तथा भी भूतार्थ है । यत दोनो नयो के विषय भिन्न है । शुद्ध नय श्रीमज्जयसेनाचार्य ने जो निश्चय और व्यवहार दोनो नयो का विषय गुण पर्यायो के भेदो को गौण कर शुद्ध एक अखड का भूतार्थ व अभूतार्थ रूप में प्रतिपादन किया है वह नित्य चैतन्य स्वरूप प्रात्मा है, जबकि व्यवहार नय द्वारा उल्लिखित विवरण में गभीरतापूर्वक भली-भाति विचाग्ने द्रव्यदृष्टि को गौण एवं पर्यायो को मुख्य कर कथन करने पर यथार्थ व न्यायोचित सिद्ध हो जाता है। से प्रात्मा ससार दशा में बद्ध, स्पृष्ट यादि रूप में ग्रहण व इमके सिवाय थीमज्जयसेनाचार्य ने ममयमार की ही प्रतिपादन करन म पाता है। अतः इस दृष्टि से व्यवहार ११५वी गाथा की टीका करते हए, निश्चय पोर व्यवहार नय भी सत्यार्थ है ? क्योकि आत्मा स्वय उत्पाद व्यय- पोकोहोलोजीमजादी और उनके सापेक्ष ध्रीव्यात्मक व स्वभावतः गुण पर्यायान्मक है । अतः अपने होने पर ही दोनो को सत्य सिद्ध किया है। उनके शब्द निम्न अपने विषय को मध्य तथा अन्य नय के विषय को गौण प्रकार :कर कथन करते हए दोनो ही नय सत्यार्थ या भूतार्थ है कि च. शद निश्चयेन जीवस्याकतं त्वमयोक्तत्व च एव मूनय होकर वस्तु का यथार्थ ज्ञान करने-कराने मे गोशातिर करन-कराने में क्रोधादिम्यश्च भिन्नत्व भवतीति व्याख्याने कृते मति द्वितीय सहायक है। पक्ष व्यवहारेण कर्तृत्व भोक्तत्वे च क्रोधादिम्यश्चाभिन्नत्व वस्तुतः एक नय (सुनय) अन्य नयो के विषय को गौण च लभ्यते एव । कस्मात् ? निश्चयव्यवहारयो परस्पर एव अपने दृष्टिगत विषय को मुख्य कर कथन करने का ही सापेक्षत्वात् । कथमिति चेत् ? यथा “दक्षिणेन चक्ष षा अधिकारी है । वस्तु में विद्यमान धर्म, गण या पर्याय को, पश्यत्ययं देवदत्तः” इत्युक्ते वामेन न पश्यतीत्युनुक्तजो अन्य नय का विषय हैं, निषेध करने या उसे झुठलाने सिद्धमिति । ये पुनरेवं परस्परसापेक्षनयविभागं न मन्यन्ते का न तो उसे कोई अधिकार व इष्ट ही होता है और न साख्यसदाशिवमतानुसारिण स्तेषां मते य-थाशुद्ध निश्चयवस्तु का वैसा (सर्वथा एकातमयी) स्वरूप ही है। जब भी नयेन कर्ता न भवति, क्रोधादिम्यश्च भिन्नो भवति तथा एक नय दूसरे नय को कदाग्रह या अहकार अथवा पक्षपात- व्यवहारेणापि,नतश्च क्रोधादिपरिणमनाभावे सति सिद्धानावश झठलाएगा या उसके विषय को गौण न कर निपेष मिव कर्मबधाभावः । कर्म बंधाभावे संसाराभावः । संसाराकरेगा तभी वह स्वय भी निरपेक्ष हो जाने से मिथ्र्यकात के भावे सर्वदा मुक्तत्वं प्राप्नोति । स च प्रत्यक्ष विरोध:-- गर्त में गिरकर प्रसत्य की कोटि में चला जाएगा । अतः ससारस्य प्रत्येक्षण दृश्यमानत्वात् ।"

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