Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 64
________________ ५६, वर्ष, ३२, कि०३-४ अनेकांत बांटने और लड़ाने का प्रयत्न न करें । भगवान् महावीर के रूप व्यवहार-चरित्न का पालन करते हुए पात्म-स्वरूप में अनुगामी होने के कारण उनपर जो अनेकांतपरक सत्य स्थिरतामयी वीतराग-निश्चय-चरित्र की प्राप्ति का सिद्धांत की ज्तोति पूर्वाचार्य परंपरा से प्रक्ष ण्ण रूप में, अभ्यास करमात्मस्वरूप में लीन होने को मोक्ष मार्ग दर्शाया मागम व अध्यात्मशास्त्रों में जगमगा रही है उसे अपनी है। प्रतः इसे यदि जिनवाणी का संक्षिप्त-गागर-में-सागर मझतावश ढंकने या बुझाने का दुरभिमान, चालाकी या जैसा सार कहा जाय तो अतिशयोक्ति न होगी। नासमझी से प्रयत्न करना और अपने दूषित अभिप्रायों को उस पर लादने का प्रयत्न करना सर्वथा अनुचित है-इस मंच को बृहद्रव्य संग्रह टीका व अन्य टीकाएं पर ध्यान दें। इस ग्रंथ की श्रीमद्ब्रह्मदेवकृत संस्कृत में एक विस्तृत प्रध में प्रतिपादित विषय अध्यात्मपरक प्रथम टीका है जो श्री परमश्रुत प्रभावक मंडल प्रगास द्वारा प्रकाशित है । यह संस्था सुविख्यात अध्यात्म यह ग्रंथ तीन अधिकारों में विभाजित है। प्रथम मर्मज्ञ श्रीमद्रायचन्द्रजी द्वारा संस्थापित है। ग्रंथ में प्रतिजीवाजीवाधिकार में केवल जीवद्रव्य का विभिन्न दष्टियों पादित विषय एवम् उसकी संस्कृत टीका के सम्बन्ध में उसकी से अवान्तर नव अधिकारी द्वारा प्रतिपादन किया गया है प्रस्तावना में हिन्दी में अनुवादकर्ता जयपुर निवासी तथा अजीव द्रव्य एवं उसके मेदों का लक्षणात्मक वर्णन सुप्रसिद्ध स्व. विद्वान् श्री पं. जवाहरलालजी शास्त्री ने अब करते हुए पचास्तिकाय में सम्मिलित द्रव्यो का सकारण से करीब ६५ वर्ष पूर्व वीर नि. २४४२ में निम्न वाक्य लिखे निरूपण भी है। दूसरे तत्वनिरूपणाधिकार में प्रास्रवादि हैं : तत्त्वो का भाव तथा द्रव्य स्वरूप उनके भेदों का सक्षेप में “इसमें ग्रथ के नामानुसार केवल जीवाजीवादि षट्दिग्दर्शन कराते हुए पुण्य और पाप का भी वर्णन किया द्रव्यो का ही वर्णन नही है। कित षट् द्रव्यो के परिज्ञान को गया है। तीसरे अधिकार में निश्चय और व्यवहार मोक्ष आत्मप्राप्ति का साधन दिखलाया गया है। इसीलिए यह मार्ग का स्वरूप दर्शाकर सम्यकनर्शन, ज्ञान, चारित्र का टीका अध्यात्म विषय का एक अच्छा ग्रथ है । प्रायः निश्चय उभय नयो से प्रतिपादन एव ध्यान की उपयोगिता, स्वरूप नय की मुख्यता को लिए हुए कथन होने से अध्यात्म विषय व भेदों को स्पष्ट करते हुए अंत मे तपश्रुतव्रत सहित सबसे कठिन विषय है। अल्पज्ञो की तो शक्ति ही नही है (व्यवहार चरित्र का भली-भाति परिपालन करनेवाला) कि वे इसके मर्म को समझ सके और जो बुद्धिमान है वे मात्मा ही निश्चय (ध्यान स्वरूप वीतराग) चरित्र का पान भी अनेकान्तमय मार्ग के मर्म को न जानने से पद २ पर हो सकता है, इसलिए तपश्रुतव्रत रूप व्यवहार धर्म के परि प्रमान्वित हो जाते हैं। यही नहीं, किन्तु कितने ही तो जैसे पालन की अनिवार्य रूप मे आवश्यकता एवं सार्थकता दिखा भाषा के प्रसिद्ध कवि और अध्यात्मरस के रसिक पं. कर अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उनमे सदा ही लीन बनारसीदासजी केवल समयसार के पढ़ने से-'करणी को रहने की प्रेरणा की गई है। रस मिट गयो भयो न आतम स्वाद । हुई बनारसि की दशा इस प्रकार, व्यवहार मोक्ष मार्ग को निश्चय मोक्ष मार्ग जेम ऊंट को पाद।" इस दोहे के अनुसार एक बार व्यवहार का साधक दर्शाते हुए प्रथकर्ता ने दोनों नयो से उन्हें परस्पर चरित्र को जलांजलि दे चुके थे। उसी प्रकार, अन्य जन भी सापेक्ष मैत्री-भाव द्वारा जीवादि द्रव्यों एवं तत्त्वों का एकान्त निश्चय मार्ग का अवलम्बन कर अनेकान्तमय जिन निरूपण किया है तथा जीवादिक जिन प्रणीत तत्त्वो की धर्म के शिखर से पतन को प्राप्त हो जाते हैं । परन्तु निश्चय यथार्थ श्रद्धा एवम् सशय-विपर्यय-अनध्यवसाय रहित के साथ व्यवहार का कथन भी विद्यमान होने से इस ग्रंथ सम्यकज्ञान की प्राराधना करते हुए अशुभ क्रियामो से में सोने में सुहागा की कहावत चरितार्थ होती है और इसके निवृत्ति एवम् शुभ (व्रत समिति-गुप्ति)क्रियामों में प्रवृत्ति- पढ़ने से भ्रम उत्पन्न होने के बदले भनेक भ्रम भाग जाते हैं।

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