Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 51
________________ धमण परम्पराकी प्राचीनता के उद्देश्य से द्रव्य का त्याग ही यज्ञ है यह मारण्यकों को उपनयन का विधान है किन्तु चार प्राश्रमों का उल्लेख मान्य नही है। हाह्मण ग्रंथो का सर्वोच्च लक्ष्य स्वर्ग था छा० उप० में है। बाल्मीकि रामायण में किसी सन्यासी पौर उमकी प्राप्ति का मार्ग था यज्ञ । किन्तु प्रारण्यको के दर्शन नहीं होते, सर्वत्र वानप्रस्थ मिलते हैं। मैं यह बात नही है । तैत्तिरीय पारण्यक में ही प्रथम बार लोकमान्य तिलक ने अपने गीता रहस्य में लिखा श्रमण शब्द तपस्वी के अर्थ में प्रागा है। है.वेद संहिता और ब्राह्मणों में सन्यास को प्रावश्यक नहीं ऋग्वेद के सकलयिता ऋषि प्ररण्यवासी ऋषियो से कहा। उल्टे जैमिनि ने वेदों का यही स्पष्ट मत बतलाया भिन्न थे। वे अरण्य मे नही रहते थे। वैदिक माहित्य में है कि गहस्थाश्रम में रहने से ही मोक्ष मिलता है (देखो परण्य शब्द के जो अर्थ पाये जाते है उनमे इस पर प्रकाश वेदान्तसूत्र ३,४,१७,२०) मोर उनका यह कथन कुछ पडता है कि ऋग्वेद में गांव के बाहर की बिना जुती जमोन निराधार भी नही है क्योकि कर्मकाण्ड के इस प्राचीन के अर्थ में अरण्य शब्द का प्रयोग हुमा है। शतपथ ब्राह्मण मार्ग को गौण मानने का प्रारम्भ उयनिषदो में ही पहले मे (५-३-३५) लिखा है 'परण्य मे चोर बसते है।' पहल देखा जाता है। उपनिषत्काल में ही यह मत अमल वहदा 'उप' (५.११) में लिखा है "मर्दे को प्ररण्य में ल में प्राने लगा कि मोक्ष पाने के लिए ज्ञान के पश्चात जाते है". किन्तु छा० उप. (८१५।३) मे लिखा है कि अरण्य वैराग्य से कर्म सन्यास करना चाहिए।' इत्यादि में तपस्वी जन निवास करते है। किन्तु प्राचीन उपनिषदो में वही पुरानी ध्वनि मिलती विद्वानो का मत है कि जब वैदिक आर्य पूरब की पोर बढे तो यज्ञ पीछे रह गये और यज्ञ का स्थान तप ने ले है-शतपथ ब्रा० (१३, ४.१.१) में लिखा है- एतद् वं लिया। किन्तु तप को स्वीकार करने पर भी प्रायं देव जरामयं मत्रं यद अग्निहोत्रम्' अर्थात जब तक जियो अग्नि प्रग्नि होत्र करो। ईशा-उप में कहा है 'कुर्वन्नेवेह तामो के पुरोहित अग्नि को नहीं छोड़ सके, प्रतः पञ्चाग्नि तप प्रवर्तित हुना। भगवान पार्श्वनाथ को गंगा के तट कर्माणि जिजीवेपत शत समाः' अर्थात् एक मनुष्य को पर पञ्चाग्नि तप तपने वाले ऐसे ही तपस्वी मिले थे। अपने जीवन भर कर्म करते हुए सौ वर्ष तक जाने की चार प्राश्रमो की व्यवस्था भो चिन्त्य है। ब्राह्मण इच्छा करनी चाहिए । बौघायन प्रौर प्रापस्तम्ब सूत्री में को ब्रह्मचारी और गहस्थ के रूप में जीवन बिताने के बाद भी गृहस्थाश्रम को ही मुख्य कहा है। स्मृतियो की भी सन्यासी हो जाना चाहिए यह नियम है वैदिक साहित्य में कुछ ऐसी ही स्थिति है। मनुस्मृति में सन्यास पाश्रम का नहीं मिलता । पौराणिक परम्परा के अनुसार राज्य त्याग कथन करके भी अन्य प्राश्रमो की अपेक्षा गृहस्थाश्रम को कर वन में चले जाने की प्रथा क्षत्रियो में प्रचचित थी। ही श्रेष्ठ कहा है। कवि-कुलगुरु कालिदास ने रघुवंश में रघुपो का इसके विपरीत जैन धर्म ले अनुमार, श्रमण-धर्म को वर्णन करते हुए कहा है अपनाये बिना मोक्ष की प्राप्ति सम्भव नही है। गृहस्थ शैशवेऽभ्यस्तविद्याना यौवने विषयषिणाम् । धर्म मुनि का लघुरूप है और जो मुनि घम को पालन वार्धक्ये मुनिवृत्तीना योगेनान्ते तनु त्यजाम् ॥ करने में असमर्थ होता है वह गृहस्थ धर्म का पालन प्रर्थात् शैशवकाल में विद्याभ्यास करते है, यौवन में करता है । विषय-भोग भोगते है, वृद्धावस्था में मनिवृत्ति प्रर्थात् वान- माचार्यकल्प प्राशाघर ने कहा हैप्रस्थाश्रम में रहते है और अन्त में योग के द्वारा शरीर त्याज्यानजनं विषयान् पश्यतोपि जिनाज्ञया । त्याग करते हैं। मोहात्यक्सुमशक्तस्य गृहिधर्मोऽनुमन्यते ॥ गौतम धर्म सूत्र (0/%) में एक प्राचीन प्राचार्य मत जो जिन देव के उपवेशानुसार मसार के विषयों को दिया है कि वेदो को तो एक गृहस्थाश्रम हो मान्य है। त्याज्य जानते हुए भी मोहवश छोडन मे असमर्थ हे उसे अथर्ववेद मौर ब्राह्मण ग्रंथो में ब्रह्मचर्याश्रम का विशेषतः गृहस्थ धर्म का पालन करने की अनुमति दी जाती है। पणाम्

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