Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 55
________________ जैन वाङमय का संगीत पक्ष 0 श्री प्यारेलाल श्रीमाल 'सरस पंडित' भारतीय संगीत को सुदीर्घ परम्पग मे जन मनीषियो स्वभाव से स्वरों का सम्बन्ध, ग्राम मर्छनाएं, गीत के ने भी समय-समय पर योगदान किया है । मगीन सम्बन्धी गुण-दोष प्रादि का विवेचन दिया गया है। उदाहरणार्थजैन ग्रन्थो के प्रबलोकन से तत्कालीन गीत, वाद्य एब सज्ज तु अग्गजे पाए उरण रिसभ सरम । नत्य-पद्धति की पर्याप्त जानकारी प्राप्त होती है। प्राचीन कण्ठगएण गधारं मज्झ जिप्राए मझियम् ।। शास्त्रकारों से लेकर प्राज के स्तवन रचयितानो तक के मामाए पंचमं बूया दतोठेणय घेवयम् । जैन विद्वानो ने संगीत कला की प्रकथनीय सेवा की है। मद्धाणेपयेण सायं मरठाणा वियाहिया ॥ जैन परम्परा के अनुसार संगीत के प्राचीन प्राचार्यों अर्थात् षहज अग्रज है, उर स्थान से ऋषभ, कण्ठ से मे भरत तथा विशाखिल का स्थान सर्वोपरि है। भरत के गान्धार, मध्य से मध्यम, नासा से पचम एवं दन्तोष्ठ से शिष्य दत्तिल कोहल नथा विशान्विल नीनों ने मगीन गथों धवत का उद्भव होता है। की रचना की थी। तीनों प्रन्यो का नाम क्रमशः दत्तिलम्, सज्ज रवइ मयूरी ककुभी ऋषभं स्वरम् । कोहलियम् तथा विशाखिलम् था। 'विशाखिलयम्' ग्रन्थ हंसौ णदई गधार मज्झिम तु गवं लगा ॥ अप्राप्य है । प्रर्धमागधी (प्राकृन) मे रचित अटट कुमभसंभव काले कोइला पंचम सरम् । 'अनुयोगद्वारमृत्त' में पद्यबद्ध मगीत विषयक सामग्री छठं च सारसा कोचा साय सतमैगमन ।। उपलब्ध होनी है। यह मूत्र ईपा को पहनी शताब्दी की अर्थात् पड्ज ध्वनि मयूर की, ऋषभ कुकुट की, रचना मानी जाती है । जैन प्रागमों को रचना का क्रमिक गान्धार हस की, मध्यम गौनों को, पंचम कोकिल की, विकास भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के उपरान्त घेवत क्रौंच की तथा निपाद सारस पक्षी की ध्वनि है। ईसवी पूर्व चौथो शताब्दी से लेकर ईसा की प्रथम शताब्दी तक अनवरत रूप से चलता रहा तथा ईमा की छठी मूत्र के अनुसार गीत के छः दोष तथा पाठ गुण बताए शताब्दी तक वर्तमान स्वरूप को प्राप्तहा । 'अनुयोगद्वार- गए है-डर कर गाना, शीघ्र गाना, धीरे गाना, तालरहित सुत्त' के अतिरिक्त 'ठाणांगसुत', 'नन्दोमुत्त', 'कप्पसुत', माना, काक स्पर से गाना तथा नाक से गाना । पाठ गुण 'रायपमेणीय' प्रादि ऐमें जैन ग्रन्थ है जिनमें मगीत हैं-पूर्ण कला से गाना, राग को रजक बनाकर गाना, विषयक सामग्री प्रचर मावा में उपलब्ध होती है। अन्य स्वर विशेष से अलंकृत करके गाना, स्पष्ट गाना, अनुयोगारमुत्त' में स्वर, गोत, वाद्य, मूछना प्रादि प्राकोशविहीन स्वर में गाना, मधुर स्वर मे गाना, तालयुक्त का सूनबद्ध विवरण दिया गया है, किन्तु मर्छनामो के गाना तथा सुकुमार रोति में गाना। नामो का क्रम भरत के समान नही है। रायहसेणीय' के जैन प्रागमों के मार्वजनिक प्रचार हेतु 'चलित' नामक अनुसार, प्राचार्यों के तीन वगं माने जाते थे-कलायरिय गीतो का प्रयोग किया जाता था। जैन सूत्रों के पठन(कलाचार्य), सिपायरिय (शिल्पाचार्य) तथा वम्मायरिय पाठन हेतु वैदिक साहित्य की उदात्त, अनुदात्त एवं स्वरित (धर्माचार्य)। गायन, वादन पौर नत्य का उल्लेख इस वाली स्वरोच्चारण प्रणाली प्रयुक्त थी। 'रायपसेणीय' प्रकार मिलता है..... 'नद्रप्रीत वाईय सरगर्म पुक्खरगय तथा 'मनुयोगद्वार' के अतिरिक्त 'बियाहषण्णत्ति', समताल' (राय, पृ० १६७) । 'ठाणागसुत्त' मे स्वरोत्पत्ति, जीवाभिगम', 'चम्बहीबपण्पत्ति' प्रादि जैन ग्रन्थों में पशु-पक्षियों की ध्वनि से सप्तस्वरों का सम्बन्ध, मानव- तत्कालीन प्रचलित वाद्यों का उल्लेख मिलता है

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