Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 56
________________ ४८, बर्ष ३२, कि०३.४ अनेकान्त 'ठाणांगसुत्त' के संस्कृत टीकाकार अभयदेव के अनुसार महस्व नरचन्द्रसूरि का सगीतज्ञ के रूप में इस ग्रंथ मे उल्लेख चौदह पुध ग्रथों में से एक था-~'पूर्वगतस्वरप्राभूत' । इसमें किया गया है । 'जंन साहित्य का बहद् इतिहास' के अनुइक्कीस मर्छनाम्रो तथा ग्यारह अलंकारों का वर्णन था। सार जैन ग्रन्थावली मे 'सगीत दीपक', 'संगीत रत्नावली' दिगम्बर जैन मुनि पभयचन्द्र के प्रशिष्य पावचन्द्र तथा 'सगीत सहपिंगल' का उल्लेख है। किन्तु इनके ने लगभग विक्रम संवत् १३८० में 'संगीतसमयसार' सम्बन्ध में विशेष जानकारी प्राप्त नहीं हुई है। वि० स० नामक महत्वपूर्ण संगीत आय की रचना की। यह ग्रन्य १४६० में माण्डव के सुल्तान मालमगाह के मन्त्रिमण्डल त्रिवेन्द्रम सस्कृत प्रथमाला में प्रकाशित हो चुका है। इसमे ने 'संगीन मण्डन' नामक ग्रन्थ की रचना की। ग्रन्थ उपनो प्रधिकरण है, जिनमे नाद, ध्वनि, स्थायो, राग, वाद्य, उपलब्ध है, किन्तु अप्रकाशित है। अभिनय, ताल प्रस्तार तथा प्राध्वयोग का सविस्तर कच्छ के महाराज लखपत (सं० १८१७ मे स्वर्गवास) उल्लेख है। इसी ससय प्राचार्य गजशेखरमूरि के शिष्य ने जैन यति भट्टारक कनककुशल व उनके शिष्य कुवरसुधाकलश ने 'मगीतोपनिषद्' नामक बृहत् ग्रन्थ की कुशल के सहयोस से 'बृजभाषा पाठशाला' स्थापित की रचना की, जो अनुपलब्ध है । किन्तु इसी लेखक की थी, जिसमें कई हिन्दी कवि तैयार हुए। कुबरकुशल विक्रम संवत १४०६ की रचना 'सगीतोपनिपत्मागेद्धार' संगीतशास्त्र के भी पण्डित थे। उनकी पाठ रचनाम्रो का उपलब्ध है, जो गायकवाड पोरिएण्टल सीरीज, बडौदा से परिचय 'बल्लभमूरि स्मृति-ग्रन्थ' मे शोधमनीषी श्री पगरप्रकाशित हो चुकी है। यह प्रति 'मगीतोपनिषद' की सार चन्द जी नाहटा ने दिया है । पाठवीं रचना 'रागमाला' है, रूप है तथा संगीत मकरन्द', 'सगीत पारिजात' जैसे जिममे राग-गगिनियो के स्वरूप तथा लक्षण दिये गये है। सगीत जगत् के मान्य ग्रन्थों से कही अधिक महत्वपूर्ण ऐसे और भी अनेक जैन ग्रन्थ हो सकते है, जिनमे है। गीत-प्रकाशन, ताल.प्रकाशन, रागादि प्रकाशन, वाद्य- सगीत विषयक महत्त्वपूर्ण सामग्री समाविष्ट है, किन्तु कई प्रकाशन नृत्यांग-प्रकाशन, तथा नृत्य-पद्धति-प्रकाशन, कालकवलित हो चुके है पोर कई शोध का विषय बने इस प्रकार इसके छह अध्याय ६१० इलोको मे निबद्ध है। हए हैं। १० ४६ का शेषाश] विवरण है। कही-कही उनके और मेरे द्वारा प्रस्तुत की है, पाठक स्त्रय समझ सकेंगे । पण्डित जी ने ध्यानभनुवाद मे बहुत बड़ा प्रन्तर पा गया है।" शतक की अन्तिम गाया को मान्यता नही दो, इसीलिए ३. इसी समय के अासपास ध्यानशतक का कुछ इसके रचयिता जिनभद्रगणि क्षमाश्रमण के होने मे सन्देह विवेचन गुजराती में पूज्य मुनिश्री पन्यास भानुविजय किया है क्योकि हरिभद सरि ने १०५ गाथाम्रो की भी जी ने लिखा, जो कि स. २०२७ मे दिव्यदर्शन कार्यालय, टीका की एवं ग्रन्थकार का नाम नही दिया। पर लगता है अहमदाबाद से प्रकाशित हुप्रा है । ३२२ पृष्ठो का यह हरिभद्र सूरि को जो प्रति मिली है, उममे ग्रंथकार के ग्रन्थ गुजराती विवेचन दृष्टि से बड़े महत्व का है । इसका नाम वाली अन्तिम गाथा नही होगी । जब अन्य प्रतियों मल्प ३) १. है। मे वह मिलती है तो, मेरी गय में, पण्डित जी को शंका नही ४. सन् १९७६ मे ध्यानशतक का एक महत्वपूर्ण करनी चाहिए थी। श्वे० परम्परा मे तो यह जिनभद्र ग्रन्थ वीर सेवा मन्दिर, दिल्ली से प्रकाशित हपा है, क्षमारूमण की ही कृति है, यह मान्यता बहुत प्रसिद्ध जिसमें पालोचनात्मक प्रस्तावना, हिन्दी अनुवाद, विविध है। यहाँ तो मुझे विगत छ: वर्षों में ध्यानशतक के जी परिशिष्ट एव सस्कृत टीका भी है । साथ ही दि. भास्कर हिन्दी के दो, अंग्रेजी के दो, गुजराती का एक अनुवाद नन्दी के ध्यानस्तव को भी अनुवाद के साथ ही दिया प्रकाशित हो चुके है, उन चार ग्रन्थों से पाठको को गया है । मू०१० रु. है । पं० बालचन्दजी शास्त्री ने परिचित करना ही प्रभीष्ट है। इस प्रथ के सम्पादन मे बहुत श्रम किया है । मूल ग्रंथ तो प्राशा है कि पाठक उनसे लाभ उठायेंगे एवं हिन्दी में टीका, अनुवाद के साथ ७२ पृष्ठो मे ही है, किन्तु इसकी कोई विस्तत विवेचन षीघ्र प्रकाशित किया जायेगा। प्रस्तावना ८५ पृष्ठो की है। इसी से वह कितनी पठनीय

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