Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 57
________________ प्राकृत का बृद्दव्यसंग्रह और उसकी महत्ता -पं० नाथूराम जैन 'डोंगरीय', इन्दौर बुद्रव्यसंग्रह प्राकृत भाषा में निबद्ध भगवान् महावीर थे। दूसरे नेमिचन्द्र वसुनंदि सिद्धातिदेव के गुरु थे, जो द्वारा उपदिष्ट अनेकांतात्मक वस्तु स्वरूप का प्रतिपादक, प्रथम (सिद्धांतचक्रवर्ती नेमिचन्द्र) से करीब ६० वर्ष जैन दर्शन का एक लघुकाय किंतु सारगर्भित एवम् महत्व पश्चात् हुए और जिनका समय विक्रम की बारहवीं शताब्दी पूर्ण ग्रंथ है। इसका समाज में व्यसग्रह के नाम से पठन- निश्चित होता है । ये सिद्धांतिदेव के पद से विभूषित थे। त्रा पाठन बडी श्रद्धा और रुचिपूर्वक किया जाता है। प्रचलित तीसरे नेमिचन्द्र गोमट्रसार (प्राकृत) की सम्कृत टीका परंपरानसार इसके रचयिता गोम्मटसार, त्रिलोकसारादि जीवतत्त्वप्रदीपिका के निर्माता थे। सिद्धांत ग्रंथो के निर्माता एवम् श्रवणवेलगोला में विराज वस्तुत: इस गथ के र यता कौन से नेमिचन्द्राचार्य थे मान् भगवान् बाहुबली के बिशाल बिब के प्रतिष्ठापक तथा इसका निर्णय इतिहास के पुष्ट प्रमाणो से ही हो सकता है, तत्कालीन राजा चामडराय के गुरु प्राचार्य प्रवर श्रीमन्नेमि कित इतना तो निश्चित ही है कि मूल ग्रथकर्ता श्रीमन् चन्द्र सिद्धातचक्रवर्ती थे इसके हिदी मे वाद्यवनिका एवम् वम् नेमिचन्द्राचार्य है और चूकि वे वीतरागी सत थे प्रत. ग्रंथ भाषा पद्यानुवाद कर्ता स्व प. जयचन्दजी छाबड़ा ने अब से की प्रामाणिकता एवम् उपादेयता भी प्रसदिग्ध है। करीब पौने दो सौ वर्ष पूर्व अपनी कृति मे इन्ही प्राचार्य को द्रव्यसग्रह का मूलकर्ता माना है तथा इसकी ब्रह्मदेव ग्रंप की विशेषता एवम वर्तमान सामाजिक परिस्थिति के सरि कृत संस्कृत टीका के हिन्दी टीकाकार श्री पं. जवाहर- संदर्भ में उपयोगिता लाल जी शास्त्री ने भी ग्रंथ की प्रस्तावना मे सिद्धांतचक्रवर्ती आचार्य नेमिचन्द्र का ही प्रथकर्ता के रूप मे उल्लेख किया यह है कि इसमें जीवादिक द्रव्यो, पाम्रवादि तत्त्वों है। इनका समय विक्रम सं. १०३५ (ग्यारहवी शताबी) एवम् मोक्षमार्ग का निरूपण व्यवहार तथा निश्चय-उभयनय है। कितु, ग्रथ की सस्कृत टीका के कर्ता श्रीमह्मदेव सूरि सापेक्ष (प्रायः प्रत्येक गाथा मे साथ २) किया गया हैने अथकर्ता नेमिचन्द्र प्राचार्य की उपाधि का उल्लेख ताकि अनेकांतमयी वस्ततत्त्व का सक्षेप में यथार्थज्ञान प्राप्त 'सिद्धांतचक्रवर्ती' न कर 'सिद्धांतिदेव' के नाम से किया है। कर मानव प्रात्मकल्याण की प्रोर अग्रसर हो सके तथा हो सकता है कि कालांतर में सिद्धांतचक्रवर्ती को ही मान सर्वथा निश्चयंकांत या व्यवहारकांत के प्राश्रय से कदाग्रही देकर संक्षेप मे सिद्धातिदेव' कहा जाने लगा हो। बनकर एकातमिथ्यात्त्व के कुचक्र मे न फंसे । अतः इसका आधुनिक इतिहासज्ञ मनीषियों की शोधखोज के निष्पक्ष एवम् जिज्ञासु भाव से अध्ययन करने पर अनेक अनुसार नेमिचन्द्र नाम के तीन प्राचार्य हुए हैं, जिनमें प्रथम प्रातियों का -जो नयों की खींचतान से उत्पन्न हो रही या राजा चामुण्डराय के गुरु सिद्धातचक्रवर्ती के पद से अलंकृत हो सकती है-सहज ही निराकरण भी हो जाता है।

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