Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

View full book text
Previous | Next

Page 33
________________ मपुरा की जन कला २९ ४. स्तूप- कंकाली टोले की खुदाई में जैन शिल्प दूसरा जैन स्तूप कुषाणकाल में बनवाया गया। इसमें की प्रदर्भात सामग्री प्राप्त हुई है। इस टीले की भूमि भनेक लेख लिखवाए गए जिन पर कुषाण सवत में तिथियाँ पर एक प्राचीन जैन स्तप और दो प्रासाद या मन्दिरों के दी गई हैं । यह नए स्तूप की विशेषता थी। इन लेखों से चित्र मिले हैं । महतनन्द्यावर्त प्रर्थात् अठारहवें तीर्थकर उस समय के माथुर जैन संघ पर अच्छा प्रकाश पड़ता अरनाथ की एक प्रतिमा की चौकी पर खुदे हुए एक लेख है। गच्छ, पुर पौर शाखामों के जो नाम माए है वे ही में लिखा है कि कोट्टियगण की वज़ी शाखा के वाचक भद्रवाह के कल्पसूत्र में है।" प्रार्य वृद्धहस्ती की प्रेरणा से एक श्राविका ने देव-निर्मित स्तुप में पहंत प्रतिमा स्थापित की।" यह लेख सवत जैन स्तप के वास्तु विभ्यास का स्वरूप लगभग वही ८६ अर्थात् कुषाण सम्राट वासुदेव के राज्यकाल का ई० था जो बौद्ध स्तुपों का था । जैन स्तप के मध्य में बद१६७ का है । वलर, म्मिथ मादि विद्वानों का विचार है बुदाकार, बड़ा पौर ऊंचा व्यूहा होता था और उसके कि उस समय स्तप के बास्तविक निर्माणकर्तामों के विषय चारो ओर वेदिका पौर चार विशामों में चार द्वार तोरण में लोगो का ज्ञान विस्मृत हो गया था और उसके लिए होते थे । उसके ऊपर भी हमिका भौर छत्रावली का देव निर्मित इस नाम की कल्पना संभव हुई।" विधान रहता था। वह भी वेदिका सहित विमेधियो पर बनाया जाता था। उसके चार पापों में तीर्थकरो की मूर्तियां लगाई जाती थीं । वेदिका के स्तम्भों पर शाल'अनेकान्त' के स्वामित्व सम्बन्धी विवरण भज्जिका मूर्तियों की रचना की जाती थी। उनके बहुत प्रकाशन स्थान-बीरसेवामन्दिर, २१ दरियागज, नई दिल्ली | से नमूने कंकाली टीले से मिले है और अब लखनऊ मद्रक-प्रकाशन -वीर सेबा मन्दिर के निमित्त संग्रहालय में सुरक्षित है। वेदिका का निर्माण वास्तु प्रकाशन अवधिमासिक श्री ओमप्रकाश जैन विन्यास का उत्कृष्ट कर्म था। उसमें ऊध्वं स्तम्भ, माड़ी राष्ट्रिकता-भारतीय पता-२३, दरियागंज दिल्ली-२ सूचियां, उष्णीष, पालम्बन, तोरण, पाश्व स्तम्भ, धाभिक चिन्ह, स्तम्भ और पायागपट्ट संज्ञक उत्कीर्ण शिलापट्ट, सम्पादक ---श्री गोकुलप्रसाद जैन तोरणद्वारो के मुखपट्ट, पुष्पाधानी या पुष्प ग्रहणी वनिराष्ट्रिकता-भारतीय पता-वीर सेवा मन्दिर २१. दरियागंज, नई दिल्ली-२ कायें, सोपान, उतार-चढ़ाव की छोटी पार्श्वगत वेदिकाये और ध्वजस्तम्भ आदि नाना प्रकार की सामग्री लगाई स्वामित्व-वीर सेवा मन्दिर, २१, दरियागज, नई दिल्ली-२ गई थी। इन स्तूपो का रूप-सम्पादन बड़े उत्सा, से मैं, मोमप्रकाश जैन, एतद्द्वारा घोषित करता हूं कि किया जाता था। उनके शिल्पो शिल्प-कौशल में निष्णात मेरी पूर्ण जानकारी एवं विश्वास के अनुमार उपयुक्त विवरण सत्य है। -प्रोमप्रकाश जैन, प्रकाशक वर्द्धमान कालेज, बिजनौर (उ० प्र०) १८. इपिग्राफिका इंडिका, भाग २, लेख २० । १९. महावीर जयन्ती स्मारिका, जयपुर, पृ० १७ । २०. भारतीय कला पृ० २८० । २१. वही पु० २६३ ।

Loading...

Page Navigation
1 ... 31 32 33 34 35 36 37 38 39 40 41 42 43 44 45 46 47 48 49 50 51 52 53 54 55 56 57 58 59 60 61 62 63 64 65 66 67 68 69 70 71 72 73 74 75 76 77 78 79 80 81 82 83