Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 31
________________ मयुरा को जैन कला २७ २. देव-देवियों को मतियां : प्रतिमा लक्षण की दृष्टि और इसी रूप में इनकी अधिकांश मूर्तियां मिली। से जनधर्म मे शासन देवतामों का बहुत महत्व है । इनके संग्रहालय में संख्या सी० २, सी०५ तथा सो. ३१ कुबेर अलकरण से जिन प्रतिमानो की पहचान और सरल हो की उल्लेखनीय मूर्तियां है, जिनमें वे सुरापान करते हुए जाती है। क्योंकि प्रत्येक तीर्थकर के अलग-अलग यक्ष चित्रित किए गये हैं। इनके हाथों में सुरापात्र बिजोरा. पौर यक्षी होते है तथा उनके लक्षण भिन्न-भिन्न होते है। नी तथा सोको शासन देवतागों के अलंकरण से परिकर में भी काफी देवियों की भी मूर्तिया मिली हैं जो अधिकतर गुप्तकाल विकास होता है। प्रनमानतः ऐसी प्रतिमाये सातवी. तथा मध्यकाल की हैं। इनमे नेमिनाथ की यक्षिणी प्राठवी सदी से निर्मित होने लगी। मधुरा शैली को अम्बिका तथा भी यथार्थ में जैनधर्म से प्रेरणा मिली। प्रारभिक काल में मूनियां दर्शनीय है।" चक्रेश्वरी देवी की एक ढाई फट मरा के कलाकार संकल्पित पट्टिया बनाते थे, जिसमे एक ऊंची पाषाण मूर्ति मथुरा संग्रहालय में विराजमान है। नमान नग्न तीर्थकर की पाल्थी मारे बैठी हुई आकृति यह मूर्ति एक गहड पर प्राधारित प्रासन पर स्थित हैं। पोजिमने बौद्धो को अपने गुरु का इस मुद्रा इसका सिर व भ जायें टूट फूट गई है, तथापि उमका करने की प्रेरणा दी। मथ गशला के महत्व- प्रभावल प्रफुल्ल कमलाकार सुप्रल कृत विद्यमान है। से एक स्तप की पाषाण वेष्ठनियो पर बनो भुजायें दश रही है और हाथ मे एक चक्र रहा है। मूति या है। यह स्तप जन स्तप था। 4 प्राभूषणास के दोनों पावों में एक-एक द्वारपालिका है जिनमे दायीं वियाँ जिनकी प्राकृतियां नितम्ब पर अत्यन्त प्रोर वाली एक चमर तथा बायीं ओर वाली एक पपबोसो तथा कमर पर पतनी है, चपल मद्रा में सट्टा र माला लिए हुए है। ये तीनो प्रतिमाये कुछ खण्डिन है। सिन्धु घाटी सभ्यता की नर्तकी बाला का स्मरण कराती प्रधान मूर्ति के ऊपर पचासन व धनस्थ जिन प्रतिमा है और उनकी प्रसन्न एव स्पष्ट काम कता, धर्मनिष्ठा एवं है, जिसके दोनों ओर बदनमालाये लिए हुए उडती कई त्याग के सन्दर्भ में जीवन के प्रति भारतीय दृष्टिकोण के मूर्तियाँ बनी है। यह मूर्ति भी कंकाली टोले से प्राप्त प्रधिकारविरोध का उदाहरण है, जिग इस प्रकार के है।" अम्बिका देवी को एक उल्लेखनीय पाषाण प्रतिमा सान्निध्य में कुछ भी प्रसगत नही प्रतीत होता । तारानाथ १ फुट ६ इंच ऊंचो मथुरा संग्रहालय में है। प्रक ने लिखा है कि मौर्यकालीन कला यक्षों द्वारा और उससे एक वृक्ष के नीचे सिंह पर स्थित कमलासन पर विराजपर्वकालीन देवो द्वारा निर्मित हई । मथ ग कला में यक्ष, मान है । बायां पैर ऊपर उठा हुग्रा व दाया पथ्वी पर किन्नर, गधर्व, सुपर्ण तथा अप्सरामो को अनेक मूर्तियां है । दायें हाथ में फलो का गुच्छा है व बाया हाथ वायी मिलती है। ये सुख-समृद्धि तथा विलास के प्रतिनिधि है। जंघा पर बैठे हुए बालक को सम्हाले है। बालक वक्षयक्षो मे कुबेर तथा उनका स्त्री हारीती का स्थान बडे स्थल पर झूलते हुए हार से खेल रहा है। प्रबोभाग महत्व का है। इनको अनेक मूर्तियाँ मथुरा में प्राप्त हुई वस्त्रालंकृत है और ऊपर वक्षस्थल पर दोनों स्कन्धो से है । कुबेर यक्षो के अधिपति तथा धन के देवता माने गए पीछे की ओर डाली हुई घोड़नी है। सिर पर सन्दर है । बौद्ध, जैन तथा हिन्दू तीनो धर्मों में इनका पूजन मकुट है, जिसके पीछे शोभनीय प्रभाबल है। गले मे दो मिलता है। कुबेर जीवन के प्रानन्दमय रूप के द्योतक है लड़ियों वाला हार, हाथ मे चूड़िया, कटि में मेखला व ६. वहा पृ० ५२। ६. श्री कृष्णदत्त बाजपेयी : मथुरा, पृ० ३५, ३६ । ७. ए. एन. बाशम : अद्भुन भारत, पृ० ३७४ ।। (The wonder that was India का वेंटेशचद्र १०. वही, पृ० ३३ । पाडय कृन हिन्दी अनुवाद) । ११.१० हीरालाल : भारतीय संस्कृति में जैन धर्म का ८. डा. वासुदवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, प. २७६। योगदान, पृ० ३५४ ।

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