Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 32
________________ २८, वर्ष ३२, कि० १.२ अनेकारत पैरों में नपूर माभूषण हैं । बालक नग्न है किन्तु गले में मथुरा की जैन शिल्प कला मे पायागपट्टों का महत्वपूर्ण हार, बाहों में भुजबन्ध, कलाई मे कड़े तथा कमर मे कर• स्थान है । विशुद्ध सौन्दर्य की दृष्टि से उन पर जो मलंकरणों धनी पहने हुए है। अम्बिका की बाजू से एक दूसरा बालक के संपूजन की छवि है वह नेत्रो को मोहित कर देती है । खड़ा है, जिसका दायाँ हाथ अम्बिका के दायें घुटने पर है। उदाहरण के लिए, सिहनादिक द्वारा स्थापित प्रायागपट्ट इसके अतिरिक्त, इस अम्बिका मूर्ति के साथ गणेश, कुबेर, पर ऊपर-नीचे प्रष्ट मांगलिक चिन्ह अंकित हैं और दोनो नर्तकियां, जिनमूति, बलराम तथा वासुदेव की मूर्ति प्रादि पावों में से एक ओर चक्रांकित ध्वजस्तम्भ तथा दूसरी मूर्तियां हैं। इस प्रकार इसमे जैन व वैदिक परम्परा के मोर गजाकित स्तम्भ है। बीच में त्रिरत्नो के मध्य मे अनेक देवी-देवतानो का सुन्दर समीकरण मिलता है। तीर्थकर की बद्ध पद्मासन स्थित मूर्ति है । (लखनऊ संग्रमथरा के ककाली टीले से एक सरस्वती की मूर्ति हालय जे० २४६)। लखनऊ संग्रहालय में एक दूसरा प्राप्त हुई है। इसका दाया हाथ अभय मुद्रा मे है और प्रायागपट्ट है (जे० २५०) जिसके मध्य भाग में एक बड़ा बायें हाथ में पुस्तक लिए है। इसकी स्थापना कुषाण स्वस्तिक अंकित है और उस स्वस्तिक के गर्भ में एक छोटी सं०५४ मे हुई। सरस्वती की इतनी प्राचीन प्रतिमा तीर्थकर मूर्ति है । स्वस्तिक के आवेष्टन के रूप में सोलह अन्यत्र प्राप्त नहीं हुई।" जैन पुराणो मे हिरण, मेढे देव योनियों से अलकत देव योनियो से प्रल कृत एक मण्डल है जिसके चार कोनो अथवा बकरा जैसे मुख वाले एक देवता का उल्लख नंग पर चार महोरम मूर्तिया है। नीचे की ओर अष्ट मांगमषिनगमेश, नंगमेय, नंगमशिन, हरिणिमिांस हरि लिक चिन्हो की वेल है। इस प्रकार के पूजापट्ट का प्राचीन नंग मेसि.हारि इत्यादि नामो स विभिन्न ग्रन्था म हुमा परिभाषा म स्वस्तिक पट्ट कहते थे। एक तीसरे पायागपट्ट है। मथुरा के कंकाली टोले से प्राप्त शुग-शक-कुषाणकालीन प्राचीन जैन अवशेषों मे भी इस देवता के कई को प्राकृति अकित है। उसके चारा और तीन मण्डल है। मूर्तादून मिले है जिनमे से एक पर 'भगवने मेसो' भगवान पहले में १६ नन्दिपद, दूसर मे अष्टदिक्कुमारिकाये और नैगमेश नाम भी अंकित है । इस देवता का देवराज इन्द्र तीसरे मे कुण्डलित पुष्पकर स्रज-कमलो की माला है और का अनुचर, इन्द्र की पंदल सेना का कप्तान बताया जाता चार कोनो में चार महोरग मूतिया है । इस प्रकार का है और शिशमो के जन्म, पोषण और सरक्षण से उसका पूजापट्ट प्राचीनकाल मे चक्रपट कहलाता था। बिशेष सम्बन्ध है । हरिवंश पुराण के अनुसार, इस देवता मथुरा सग्रहालय में एक सुन्दर आयागपट्ट है जिसे, ने कस के बन्दीगृह से देवकी द्वारा प्रसूत शिशुनों को, उस पर लिखे हुए लेख के अनुसार लवणशोभिका नामक इद्र की प्राज्ञा से अलका सठानी की गोद में स्थानान्तरण वेश्या की लड़की वसु ने दान दिया था। इस मायागपट्ट कर रक्षा की थी।" पर एक विशाल स्तूप का चित्र तथा वेदिकामो सहित ३. मायागपट्ट तथा विकास्तम्भ-मायागपट्ट का तोरणद्वार बनाया है। प्रायागपड़ो के अतिरिक्त अन्य मल है प्रायंकपट प्रर्थात् पूजा के लिए स्थापित शिलापट्ट विविध शिलापट्र तथा वेदिका स्तम्भ भी मिले हैं, जिन पर जिस पर तीर्थकर, स्तूप, स्वस्तिक, नद्यावर्त प्रादि पूज- जैनधर्म सम्बन्धी मूर्तियां तथा चिन्ह अंकित है। इन कलानीय चिन्ह उत्कीर्ण किए जाते थे। स्तूप के प्रांगण में इस कृतियों पर देवता, यक्ष-यक्षी, पुष्पित लता-वृक्ष, मीन, प्रकार के पूजा शिलापट्ट या पायागपट्ट ऊचे स्थंडिलों पर मकर, गज, सिंह, वृषभ, मंगलघट, कीर्तिमुख भादि बड़े स्थापित किए जाते थे और दर्शनार्थी उनकी पूजा करते थे। कलात्कक ढंग से उत्कीर्ण मिलते है।" १२. वही पृ० ३५५.३५६ । १६. डा. वासुदेवशरण अग्रवाल : मथुरा की जैन कला १३. वासुदेवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, १० २८३ । (महावीर जयन्ती स्मारिका, जयपुर, अप्रैल १९६२, १४. भारतीय संस्कृति मे जैनधर्म का योगदान,प. ३५८ । पृ० १९-२० । १५. जैन सन्देश शोधांक, १९७४ । १७. श्री कृष्णदत्त बाजपेयी: मथुरा पु० ३३ ।

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