Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 30
________________ मथुरा की जैन कला 3 डा. रमेशचन्द जैन, बिजनौर मथुरा की जैन कला भारतीय कला में अपना दोनो पोर सिंह भी उत्कीर्ण रहते हैं। कभी-कभी ये सिंह विशिष्ट स्थान रखती है। अभिलेखों तथा साहित्यिक प्रासन को धारण किए हुए दिखलाए गए है। ऋषभदेव ग्रन्थों से यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि मथुरा के कंकाली के कधों पर नटे और सूपार्श्वनाथ के मस्तक के पीछे टीले वाले भूभाग पर ईसा की कई शती पहले से सर्पफण का टोप दिखाया गया है। चौकी पर कही-कहीं लेकर ११वी शती तक जैन स्तूपों, मन्दिरो एवं श्रावक (गृहस्थ) भी बनाए गए है जो धर्मचक्र या तीर्थ. विविध मूतियों का निर्माण होता रहा । इतने लम्बे कर की पूजा के लिए पाए है । कला की दृष्टि से इन समय तक वास्तु तथा मूर्तिकला के विकास का केन्द्र होने मूर्तियों की शैनी कुछ स्थिर है. जैसा उनकी तपोमुद्रा या के कारण ककाली टीले का क्षेत्र असाधारण महत्व समाधि से संगत था । गुप्तकालीन कुछ मूर्तियो मे सौदर्य रखता है। मथुरा जन कला को निम्नलिखित भागों में और अगों में गतिशीलता है और कुछ अलकर भी है। बाटा जा सकता है: महावीर की एक मूति के जो उस्थित पद्मासन में बैठी है, मस्तक के पीछे पद्मातपत्र और ऊपर छल्लेदार केश है । १ तीर्थकर मतियां : जिससे संसार सागर को पार हरामे अंगों का विन्याम लोव भरा है और मख पर दिव्य किया जाय उसे तीर्थ कहते हैं। तीर्थ को जो प्रवृति छवि है। कई चतुर्मखी प्रतिमायें भी प्राप्त हुई है। इन्हे करे उसे तीर्थकर कहते है । जैनों मे तीर्थकर मूर्तियो को 'सर्वतोभद्रिका' कहा जाता है। गुप्तों के राज्यकाल में स्थापना बहुत प्राचीन काल से प्रचलित है । ये सख्या में साहित्य के साथ-गाथ कला एवं स्थापत्य का खूब मंवर्धन २४ होते है । मथुरा कला मे आदिनाथ, नेमिनाथ, पाश्व हुमा । इग काल मे शिल्पशास्त्र पर भी पुस्तकें लिखी नाथ, महावीर प्रादि तीर्थवरो की मूर्तियां प्राप्त हुई है जाने लगी। मदिरों और प्रतिमानो की रचना कैसे होनी जो प्रायः पचासन है। कुछ खड्गासन मूर्तियाँ भी प्राप्त चाहिए, इसका भी विशद विवेचन किया गया । यही हुई है। समस्त मूर्तियां लग्न, नासाग्रदृष्टि मोर ध्यान कारण है कि गुकान की मूर्तियाँ भाव से परिपूर्ण है । मुद्रा में है। कुषाणकालीन प्रतिमानों में नाना तीर्थकरों उनमे शान्ति है तथा उनकी रचना सुरुचिपूर्ण ढंग से की मे भेद सूचित करने वाले बैल आदि चिन्ह नही प्राप्त गई है। कला के जो भी उदाहरण मिलते हैं उनमें इस होते है। अधिकाश मूर्तियों के वक्षःस्थल पर श्रीवत्स काल की विशेषता विद्यमान रहती है। इन विशेपतामो चिन्ह पाया जाता है तथा हस्ततल व चरणतल एवं सिहा- के आधार पर उन्हें पहनानना बहा प्रामान है। इमी सन पर धर्मचक, उष्णीष तथा भौहो के बीच रोमगुच्छ काल से जिन पतिमाओ पर तीर्थ करो के लॉछन भी उत्कीर्ण भी बहत-सी मूर्तियों में पाए जाते है । अन्य परिकरों में किए जाने लगे, यद्यपि बिना लांछन के भी प्रतिमानों का प्रभावल, दोनों पावों में चमरवाहक तथा सिंहासन के निर्माण जारी था। १. श्री कृष्णदत्त वाजपेयी : कंकाली टोला की जैन कला का योगदान, पृ० ३४३ । ___ का अनुशीलन (बरेया स्मृति ग्रन्थ, पृ.६०८) ४. डा. वासुदेवशरण अग्रवाल : भारतीय कला, पृ. २८४ । २. श्री कृष्णदत्त वाजपेयी : मथुरा, पृ० ३३ ५ . श्री हरिहरसिंह : तीर्थकर प्रतिमामों का उद्भव और ३. डा. हीरालाल जैन : भारतीय संस्कृति में जैन धर्म विकास (श्रमण वर्ष २५, अंक १-२), पृ० ५० ।

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