Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 40
________________ ३६, वर्ष ३२, कि० १.२ अनेकान्त श्रमण-संस्कृति अहिंसा, अपरिग्रह और अनेकान्त के मिलावट, तस्करी प्रादि का व्यापार परिग्रह का ही जघन्यउदात्त दृष्टिकोण की त्रिपुटी पर माधृत है । अनेकान्त की तम रूप है । हम धन से दूसरे की सहायता करते भी है, उदार विचारधारा श्रमण-संस्कृति का महाघं अवदान है। तो स्वामित्व की भावना रखकर ही । स्वामित्व की भावना अनेकान्त यदि वैचारिक उदात्त दृष्टिकोण का प्रतीक है, का त्याग हम नही कर पाते। इसमे अपरिग्रह का सही | और अपरिग्रह प्राचारगत उदारता का परि- रूप तिरोहित ही रह जाता है। प्रोर फिर, हम संकीर्ण चायक । श्रमण-संस्कृति का अहिंसावाद भी सीमित परिघि भावना से ऊपर नही उठ पाते, हमारा वैचारिक दष्टिकी वस्तु नहीं है । प्राणिवध जैसी द्रव्यहिंसा से भी अधिक कोण उदात्त नही हो पाता । श्रमण-संस्कृति अपरिग्रह के ध्यापक भावहिंसा पर श्रमण-संस्कृति बल देती है । उसका माध्यम से हमें उदात्त दष्टिकोण प्रदान करती है, जिससे मन्तव्य है कि मूलतः भावहिंसा ही द्रव्यहिंसा का कारण हमारे अन्तर्मन मे सर्वोदय की भावना का संचार होता है है। यदि भावहिंसा पर नियन्त्रण हो जाय, तो फिर द्रव्य- और जनमानस ग्रहण की सकीर्ण भावना से त्याग की सा का प्रश्न ही नही उठे। आज सामाजिक जीवन मे उदात्तभमि की पोर अभिमख होता है। भावहिंसा की प्रधानता से ही द्रव्याहिंसा होती है और यही श्रमण-मंस्कृति का अनेकान्तबाद उसकी उदात्त दृष्टि फिर भयकर युद्ध और भीषण रक्तपात मे परिणत हो का एक ऐसा प्रकाश-स्तम्भ है, जिससे सम्पूर्ण विश्व का जाती है। जीवन-दर्शन पालोकित है। अनेकान्त, जनसमुदाय को जाति और धर्म की भावना में सकीर्णता पाने पर दुराग्रहवादिता को सकीर्ण मनोवृत्ति से मुक्त होने की हिंसा का उदय स्वाभाविक है। इस स्थिति मे पुण्य की प्रेरणा देता है। दर्शन के क्षेत्र में या फिर जीवन के परिभाषा परोपकार न होकर सामान्य वैयक्तिक पूजा- व्यावहारिक जगत् मे व्याप्त श्रेष्ठ-अश्रेष्ठ की भावना के में नि.शेष हो जाती है । जात्यभिमान हपे अधःपतन व्यामोह का विलोप अनेकान से ही सम्भव है। नीरकी मोर ले जाता है और इससे हम मानवता का निरादर क्षीर विवेक की सम्प्राप्ति एकमात्र अनेकान्त से ही हो कर बैठते हैं। इसीलिए, भगवान् महावीर ने कर्मणा जाति सकती है। सत् के प्रति आसक्ति और असत् के प्रति की परिभाषा प्रस्तुत करते हुए कहा : वैराग्य अनेकान्त की भावना से ही आता है। कम्मुणा बम्भणो होइ कम्मुणा होइ खन्तिप्रो। भाषिक शुद्धि की दृष्टि से स्थाद्वाद और वैचारिक कम्मणा बइस्सो होइ सुद्दो हवइ कम्मणा ।। शुद्धि की दृष्टि से अनेकान्तवाद की स्थापना श्रमण-- उत्तरा०, २५१३१ । सस्कृति की उदात्तता ही पार्यन्तिक रूप है। आज हम महिसाबाद पर अनास्था के कारण हो अाज समाज किसी वस्तु को एकान्त दृष्टि से सत्य मानने का भ्रम में जातिगत हीनभावना का विस्तार हो रहा है। जाति पालते है। किन्त, अनेकान्तवाद इस म्रम को दूर करता के सम्बन्ध में हमारा दृष्टिकोण उदात्त नहीं रह गया है। है। किसी वस्तु को हम एकान्त दृष्टि से सत्य मानकर हम इसीलिए ऊँच-नीच, छुपात भादि के घेरे में बन्दी अपनी अनुदात्त दृष्टि का ही परिचय देते हैं। कोई भी बनते जा रहे है। श्रमण-संस्कृति इसी दुरभिमान को मानव एकान्त भाव से पूर्ण नहीं होता। यदि हम किसी चनौती देती है और सघोष उद्घोषणा करती है : 'मेत्ती दर्शन तत्वज्ञ को पण्डित मान लेते है, तो यह एकान्त मे सव्वभूएसु।' दष्टि हुई । सम्भव है, उस पण्डित को सांख्यिकी मे तत्वसामाजिक अवधारणा के सदर्भ में अपरिग्रहवाद भी ज्ञता प्राप्त नही, तो फिर उसे एकान्त भाव से पण्डित श्रमण-सस्कृति के उदात्त दृष्टिकोण का परिचय प्रस्तुत कहना उचित भी नही। अनेकान्त दृष्टि से दर्शन की करता है। अपरिग्रह का तात्पर्य धन के प्रति स्वामित्व की अपेक्षा यदि वह पण्डित है, तो सांख्यिकी की अपेक्षा पडित भावना का परित्याग है। अनावश्यक संचय से सामान्य नही भी है : इमी विचारधारा के आधार पर अनेकान्त मे लोकजीवन को कष्ट पहुंचता है। धूसखोरी, जमाखोरी, 'सप्तभंगी नय' की प्रतिष्ठा हुई है । इस नथ के द्वारा हम

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