Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 35
________________ अनेकान्त अनेकान्त । परस्पर सापेक्ष अनेक धर्मों का सकल भाव से इच्छन् प्रधान सत्वाछविरुद्धंगुम्फितं गुणः। ग्रहण करना सम्यगनेकान्त है और परस्पर निरपेक्ष अनेक सांख्य संख्यावतां मुख्योनानेकान्त प्रतिक्षिपेत ।' घमों का ग्रहण मिध्या अनेकान्त है । अन्य सापेक्ष एक अर्थात एक ज्ञान को अनेकाकार मानने वाले समझघम का निषेध करके एक की अवधारणा करना ही। दार बौद्धों को अनेकान्त का प्रतिक्षेप नहीं करना चाहिए मिथ्य कान्त है। उसी अनेक प्राकार वाले एक चित्र रूप को मानने वाले अनेकान्त अर्थात सकलादेश का विषय प्रमाणाधीन नयायिक और वैशेषिकों को अनेकान्त प्रतिक्षेप नहीं करना होता है और यह एकान्त की अर्थात् नयाधीन विफलादेश चाहिए । साख्याचार्यों व अन्य को भी इसका प्रतिक्षेप नही के विषय की अपेक्षा रखता है। यही तथ्य यू परख । करना चाहिए क्योकि भनेकान्त तो वस्तु के यथार्थ रूप अनेकान्तोऽप्यने कान्त. प्रमाणनयमाधनः । को परखने का माध्यम है। अनेकानप्रमाणात्ते तदेकान्तोर्शतान्नयात् ।। प्रत्येक वस्तु विराट है और अनन्त-प्रनन्त अंशों धर्मों प्रति प्रमाण और नय का विषय होने से अनेकान्त, गुणों और शक्तियों का पिंड है अर्थात वस्तु का अनेक पाने व धर्मवाला पदार्थ भी अनेकान्न रूप है वह जब धर्मात्मक होना स्वाभाविक है।' प्रमाण के द्वारा समग्रभाग से गहीत होता है तब वह अने एक मनुष्य जिस रूप में वस्तु को देख रहा है उसका कान्त पने धर्मात्मक है और जब किमी विवक्षित नय स्त्ररूप उतना ही नही वरन् विभिन्न दृष्टिकोणों से कुछ का विषय होता है तब एकान्त, एक धर्म रूप है । उम और भी है। जल पदि एक मनुष्य की प्यास बुझाकर समय शेष धर्म पदार्थ में विद्यमान रहकर भी दृष्टि के तृप्ति प्रदान करता है, तो वही जल एक हैजे के रोगी के मापने नही होते । इस तरह पदर्थ की स्थिति हर हालत में लिए विष तुल्य मृत्यु का कारण भी बन जाता है । इसी अनेकान्त रूप ही सिद्ध होती है। प्रकार यदि दूध स्वास्थ्यवर्द्धक है तो वही अतिसार के अनेकान्त दृष्टि या नय दृष्टि विराट वस्तु को जानने रोगी के लिए विप तुल्य मृत्यु का कारण भी है । कहने का वह प्रकार है जिसमे विवक्षित धर्म को जानकर भी का तात्पर्य कि एक ही वस्तु विविध रूप प्रकट करने म अन्य धर्मों का निषेध नही किया जा सता, वरन् उन्हे सक्षम है। गौण गा प्रविवक्षित कर दिया जाता है । इग प्रकार, जब पनृष्ण की दृष्टि अनेकान्त को दृष्टिगत करने वाली बन वस्तु वोध ही धर्म और दर्शन का उद्देश्य है बोध जाती तब उसके समभाने का ढंग भी निराला हो मुक्ति का माधन है यपि वोध के साथ नम्रता, उदारता, जाता है, अर्थात वस्तु तत्व का यथार्थ प्रतिदिन किया निष्पक्षता, सहिष्णुता और सात्विक जिज्ञासा है तब वह जाता है। प्रात्म विकास की सीढी है। अनेकान्त की वरीयता को परराव कर हो प्राचार्य अनेकान्त दष्टि परस्पर विरोधी वादो का समन्वय हेमचद ने वीतराग स्तोत्र मे पहा है कि --- करने वाली परिपूर्ण सत्य की प्रतिष्ठा करने वाली और विज्ञानस्य कमाकार नानाकारक रम्वितम् । बुद्धि में उदारता, नम्रता, महिष्णुता तथा सात्विकता इच्छस्तथागतः प्राज्ञा नानेकान्त प्रतिक्षिपेत ।। उत्पन्न करने वाली है। यह विश्व दर्शन के लिए एक चित्रमेकमनेक च रूपम् प्रामाणिक वदन् । अनुपम थाती है। 07 योगो वैशेषिको वापि नानेकान्तप्रतिक्षिपेत ।। मेघनगर (म. प्र.) १. डा. महेन्द्रकुमार--- जैन दर्शन, पृ० ५२५ । ३. वीतराग स्तोत्र, ८ से १०। २. बृहत्स्यम्भूस्तोत्र १०२। ४. स्यावाद मम्जरी, कारिका-५ ।

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