Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 24
________________ २०, पर्व ३२, कि० १-२ अनेकान्त इन चातुर्यामों का उपदेश दिया था। ये चातुर्याम है- मान, सन्मति और प्रतिवीर कहलाए। महावीर जयन्ती पहिसा, सत्य, मस्तेय, अपरिग्रह । महावीर पार्श्वनाथ के और वीर निर्वाण दिवस भर्थात दीपावली बीरप्रभ के श्रमण धर्म के अनुयायी थे। महावीर ने अपने युग में लोकोत्तर स्मरण में ही मनायी जाती है। श्रमण महावीर समाज में स्वतंत्र ब्रह्मचर्य की प्रावश्यकता का गहरा धनु- अन्तिम तीर्थकर थे। इनके साथ ही तीर्थकरों की परम्परा भव किया और चातुर्याग में अलग ब्रह्मचर्य को मिलाकर समाप्त हो गयी। चक्रवर्ती वलभद्र, वासुदेव, प्रतिवासुदेव पंच महाव्रतों का उपदेश दिया। पार्श्वनाथ के जीवन से पाटिभी के प्रचार.air Heral सम्बन्धित पनेक प्रभावक कथाए बाज भी जेन जनताम योगदान रहा है। विस्तारमय से यहा उनको चर्चा नहीं प्रपना पूर्ण प्रभाव रखती है । कमठ का उपसर्ग तथा नाग-नीज नाग की जा रही है। वैमे तीर्थडुरो के वर्णन द्वाग उनकी नागिन की कथा ऐसे हो लोमहर्षक प्रसंग है। पाश्वनाथ बहुत कुछ पूर्ति भी हो जाती है। राजस्थान, उड़ीसा, बंगाल आदि की प्रादिम जैनेतर धन गठ शलाका पुरुषो के पश्चात् गणघरो, थनजातियों में भी पूज्य है। ये जातियां आज भी पाश्वनाथ केवलियो और जैनाचार्यों की विशाल परम्परा प्रारम्भ की पूजा करती है। सम्भवतः भारत में नाग पूजा का हुई । यह परम्परा तिगिक, सैद्धान्तिक, पौराणिक एवं मूल भाषार पाश्र्वनाथ का चिह्न नाग रहा होगा। साहित्यिा दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है । श्रमण महावीर : श्रमण महावीर के पश्चात - पार्श्वनाथ के लगभग २५० वर्ष बाद वैशाली के उप- श्रमण महावीर पर्यत जिनवाणी लेखन का प्रारम्भ नगर कुण्डग्राम अथवा कुण्डलपुर मे चैत्र शुक्ला त्रयोदशी नही हना था। महावीर के गणधरों द्वारा उनकी वाणी के दिन महावीर का जन्म हुमा। भगवान महावीर का के निलित रूप का भी शुभारंभ हुआ। अब जैन-धर्म का सम्पूर्ण जीवन पाज दर्पण के समान स्पष्ट है। उनके शंशव- विस्तार देश के विभिन्न भागो मे पर्याप्त वेग से होने लगा कशोर, तारुण्य मोर परवर्ती जीवन की महानता सुविदित था। नीर निर्वाण की द्वितीय शताब्दी तक समस्त जैन मुनि है। अहिंसा और अपरिग्रह के वे अवतार थे। धर्म में एक प्राचार्य एक सूत्र में प्रावद्ध थे। उनम कोई मतभेद न वौद्धिकता-निजविवेक को महावीर ने पर्याप्त महत्व दिया। था। इसी शनी मे बिहार में द्वादशवर्षीय दुभिक्ष पड़ा। अन्धविश्वास और अन्धानुकरण का तथा व्ययसाध्य सहस्रो मनि दक्षिण भारत मे तथा राजस्थान, गुजरात मे प्राडम्बर और क्रियाकाण्ड का भी श्रमण महावीर ने अनो- प्रस्थान कर गये। जहां उन्हे परिस्थितिवश नग्नत्व ढकने के चित्य सिद्ध किया और जीवन भर इनका विरोध भी लिए कुछ वस्त्र धारण करने की सघाचायों द्वारा अनुमति करते रहे। दे दी गयो । अकाल समाप्त होने पर मुनिगण पुनः एकत्र धर्म मे पाधार से भी अधिक वैचारिकता को महत्त्व हुए और वस्त्रोपयोग की वैकल्पिकता पर उनमें बहुत मतदिया। महावीर समदी और अनेकान्तवादी थ । मतः भेद हो गया। परिणामतः यही से जैन साधुग्रो के दो विरोध करते समय विरोधी के प्रति भी उनके मन में पूरा वर्ग हो गये। फिर ये दिगम्बर पौर श्वेताम्बर शाखाए सद्भाव होता था। फलत: विरोधी भी अन्ततः उनका अनेक उपशाखामो के साथ विकसित हुई। धीरे-धीरे मित्र बन जाता था। तीस वर्ष की आयु में ही महावीर मुनिमार्ग, सिद्धान्तपक्ष और प्राचार परम्परा मे भी अन्तर ने दीक्षा ले ली। तत्पश्चात् बारह वर्ष तक वे तप में आ गया। लीन रहे । अन्तिम तीस वर्ष तक वे धर्मोपदेश देते रहे। भगवान महावीर के ग्यारह गणधर थे । इनमे प्रधान ७२ वर्ष की आयु में नश्वर शरीर को त्याग कर श्रमण गगधर गौतम इन्द्रभूति थे। इन्होंने महावीर के उपदेशो महावीर ने मुक्तिवधू का वरण किया। महावीर अपने को बारह अंगो और चौदह पूर्वो में निबद्ध किया। जैन जीवन के पांच महाप्रसंगो के कारण वीर, महावीर, वर्ध- परम्परा के अनुसार ज्ञानियो के दो ही पद सर्वश्रेष्ठ माने

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