Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 21
________________ जैनधर्म: उदभव और विकास पौर लोक मान्यतामों का प्राश्रय लेना पड़ता है । पुराण भमि की व्यवस्था मारम्भ हुई। ज्यों-ज्यों भोग्य वस्तयों पौर जनश्रति केवल उमग पोर भावुकता की उपज नहीं का प्रभाव बढ़ता गया, मानव मे संयमबत्ति, होर पोर है। उनमे इतिहास के जड़ सत्य, भौतिक सत्य प्ररि घटना ईर्ष्या भी बढ़ने लगी। इसी के परिणाम स्वरूपात चक्के मतही स्तर को पार कर जीवन प्रोर उसके रस का सभ्यता का विकास हपा। मादान-प्रदान, श्रम, बाजार, भीतर से देखने और चखने की अद्वितीय क्षमता होती है। नाता-रिश्ता, दण्ड व्यवस्था प्रादि का क्रम प्राया। फिर माता-रिश्ता टा जैन परम्परा : भी यह सब अत्यन्त प्रारम्भिक अवस्था ही थी।माज की जैन परम्परा के अनुसार यह दृष्यमान जगत सदा नगर-मभ्यता से इसकी तुलना नहीं की जा सकती। कालचक्र में नियन्त्रित रहता है । इस कालचक्र के दो कल्प उक्त चौदह कुलकरों मे अन्तिम कुलकर नाभिराय माने गये है। ये छ: भागो मे विभक्त है। सुखमा सुखमा, हुए। ये हा भगवान ऋषभदेव के पिता थे । पादि तीर्थकर ऋषभदेव से ही कर्मभमि व्यवस्था का सच्चा, नैतिक एवं सुखमा, सुखमा-दुखमा, दुखमा-सुखमा, दुखमा-दुखमा । जिस प्रकार गाडी का पहिया ऊपर से नीचे और नीचे से वैज्ञानिक मूत्रपात हुआ। पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, सुख-दुख, हिसा-अहिंसा मादि का ज्ञान महाश्रमण मादिनाथ ने ही ऊपर घूमता रहता है, उसी प्रकार यह कालचक्र भी घूमता । समस्त विश्व को कराया। प्रतः पूर्व कुलकरों के द्वारा रहता है, अर्थात् जगत एक बार सुख से दुख की ओर जाता है और दूसरी बार दुग्व से सुख की पोर पाता है। सुख से प्रारम्भिक स्थूल जीवन क्रिया का ही प्रारम्भ किया जा दुग्व की ओर जाने को अवसपिणीकाल कहते है और दुख से सकता था। कुलकरों के इस तृतीय काल के पश्चात् सुख की कोर पाने को उत्सपिणीकाल कहते है। इन चतुर्थकाल मे जिन सठ शलाका पुरुषों, अर्थात् गणनीय महान् पुरुषों ने कर्मभूमि की सभ्यता का विकास अपने दोनो कल्पों की अवधि लाखों वर्षों की होती है। लोकोत्तर चरित्र और उपदेशों द्वारा किया, वे हैं--- इम ममय दुखमा नामक पंचम अवसर्पिणीकाल चल २४ तीर्थकर :-ऋषमदेव, अजितनाथ, सम्भवनाय, रहा है। अभिनन्दन, सुमतिनाथ, पद्मप्रभु, सुपाश्वनाथ, चन्द्रप्रभु, पुराणों मे प्रारम्भ के दो कालो को भोगभूमिकाल कहा गया है। इन कालों मे अाधुनिक ग्राम-सभ्यता या पुष्पदन्त, शातलनाथ, श्रयासनाथ, वासुपूज्य, विमलनाथ, नगर-सभ्यता नहीं थी। इस युग में कल्पवृक्षो से ही जीवन अनन्तनाथ, धर्मनाथ, शांतिनाथ, कुंथुनाथ, अरहनाथ, अ. की सारी ग्रावश्यकतायं पूरी होती थी। मनुष्य इस युग मल्लिनाथ, मुनिसुव्रत, नमिनाथ, नेमिनाथ, पार्श्वनाथ, मे परिवार और घर जैसी चीजो से अपरिचित थे। कृषि महावीर । प्रादि का ऋण भी उस काल मे नही था। भाई-बहिन में १२ चक्रवर्ती :-भरत, सगर, मघव, सनतकुमार, विवाह अनायास हो जाता था। माता-पिता पर सन्तान शान्ति, कुन्थु, परह, सुभोम, पद्म, हरिषेण, जयसेन, ब्रह्मका कोई उत्तमदायित्व न था। सदा युगल जन्म होता दत्त ।। था। ये दोनो भाई-बहिन धीरे-धीरे बड़े होकर पति- ६ वलभद्र :-प्रचल, विजय, भद्र, सुप्रभ, सुदर्शन, पत्नी बन जाते थे। माता-पिता का इनके बड़े होने में प्रानन्द, नन्दन, पद्म, रामचन्द्र । कोई हाथ न था। अंगुष्ठचषण प्रादि क्रियानो के द्वारा वासुदेव नारायण :-त्रिपुष्ट, द्विषष्ठ, स्वयम्भ, ये दोनो ४६ दिनो में तरुण हो जाते थे। इस समस्त पुरुषोत्तम, पुरुषसिंह, पुरुषपुण्डरीक, दत्त, नारायण, कृष्ण। व्यवस्था को पुराणो में भोगभूमि व्यवस्था कहा गथा है। ६ प्रतिवासुदेव प्रतिनारायण :-प्रश्वग्रीव तारक यह व्यवस्था सहस्रो लाखों वर्ष चली। फिर तीसरे काल मेरक, मधु, निशुम्भ, बलि, प्रहलाद, रावण, जरासन्ध । में यह भोगमि की व्यवस्मा क्रमशः कम होती चली गई। जैन पुराणो मे भारतवर्ष का इतिहास उसकी भौगोइसी तृतीय सुग्वमा दुखमा नामक काल में चोदह कुलकरो लिक स्थिति के सदर्भ के साथ वणित है। भारत जम्ब. का जन्म हुमा । इन कुलकरो के द्वारा ही धीरे-धीरे कर्म- द्वीप के दक्षिणी भाग में स्थित है। इसके उत्तर में हिम

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