Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 20
________________ जैनधर्म : उद्भव और विकास - डा. रवीन्द्र जैन, मद्रास जैन धर्म विश्व के प्रमुख एवं प्राचीन धर्मों में अपना याकोबी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक के नवम भाग मे स्पष्ट महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। बीसवी शती के प्रथम चरण लिखा है--पार्श्वनाथ जैनधर्म के संस्थापक थे, इसका कोई पर्यंत अनेक पौर्वात्य एव पाश्चात्य विद्वान इस धर्म को भी प्रमाण नही है। जैन परम्परा प्रथम तीर्थंकर ऋषभहिन्दू धर्म की एक सुधारवादी शाखा के रूप में स्वीकार देव को जैनधर्म का सस्थापक मानने मे एकमत है।' करते थे। इसकी ऐतिहासिकता को भी श्रमण महावीर विश्वविख्यात दार्शनिक डा. राधाकृष्णन ने भी से पधिक प्राचीन नहीं मानते थे। दूसरी पोर अन्य धर्मा- अपनी प्रख्यात पुस्तक 'भारतीय दर्शन" मे स्पष्ट लिखा वलम्बियों के समान जैन धर्मानुयायी विद्वान अनेक है --'नि मन्देह जैन धर्म वर्धमान और पार्श्वनाथ से भी विश्वासमूलक एव पौराणिक तर्कों के प्राधार पर जैनधर्म पहने प्रचलित था। यजुर्वेद में ऋषभदेव, अजितनाथ और को प्रनाद्यनन्त भी सिद्ध करते चले पा रहे थे। प्राचीनता अरिष्टनेमि इन तीन तीर्थकरों के नामो का निर्देश है। में महानता देखना मानव मात्र को संस्कारी प्रवृत्ति है भागवत पुराण द्वारा भी इस बात का समर्थन होता है भोर भारत मे तो यह चरम पर रही है। कि ऋषभदेव जैनधर्म के सस्थापक थे।' पाज ऐतिहासिक एव वैज्ञानिक अनुसंधान कार्यों के ऋग्वेद मे वातरशना मनियों पौर केशी से सम्बफलस्वरूप अनेक प्रामाणिक परिणाम सामने पाये है। न्धित कथायें भी जैनधर्म की प्रागैतिहासिक प्राचीनता का इन परिणामों का श्रेय मूलतः पाश्चात्य विद्वानों को है। पुष्कल प्रमाण प्रस्तुत करती है। ऋषभदेव और केशी का प्रस्तुत निबन्ध मे उक्त तथ्यों के प्रालोक मे जैनधर्म को साथ-साथ उल्लेख भी इसी प्राचीनता का द्योतक है। प्राचीनता एव परम्परा का अनुसधान प्रस्तुत किया गया वैदिक साहित्य मे मुनियो के माथ यतियों और व्रात्यो का है। प्राच्य विद्याओं के विश्वविख्यात अनुसन्धाता डा० वर्णन पर्याप्त मात्रा मे प्राप्त होता है। ये तीनो मूलतः हर्मन याकोवी ने अपनी जैन सूत्रों की व्याख्या में जैनधर्म श्रमण परम्परा के ही है। इनके माचरण भोर स्वभाव की प्राचीनता पर पर्याप्त ठोस प्रमाण प्रस्तुत किये है। मे तथा वैदिक ऋषियो के सामान्य स्वभाव और प्राचरण उनके अभिमत का सार है :-'इस तथ्य से अब सब सह- मे जो व्यापक मन्तर है, वह सहज ही स्पष्ट दृष्टिगोचर मत हैं कि वर्धमान बुद्ध के समकालीन थे। स्वय बौद्ध होता है। प्राहार, तप और यज्ञादि की हिंसात्मक या प्रन्यों में इस बात के प्रमाण है कि श्रमण महावीर से पूर्व शिथिल प्रवृत्ति मे श्रमण साधु विश्वास नहीं रखते थे । जैन या माहंत धर्म विद्यमान था और महावीर इसके ये स्वभावतः अधिक शान्त और सयमी थे। संस्थापक थे ऐसा कोई भी उल्लेख बौद्ध ग्रन्थों में प्राप्त इस विवेचन से यह स्पष्ट है कि जैनधर्म प्रत्यन्त नहीं होता है।' प्राचीन है। इतिहास भी अभी तक उसके समय का पूर्ण जैनधर्म की प्राचीनता पर जर्मन विद्वान डा० हर्मन निश्चय नही कर सकता है। ऐसी अवस्था मे हमें पुराणों "There is no doubt that Jainism prevai- Ajitnath and Aristnemi. The Bhagvat led even before Vardhmana or Parswa- Purana endorses the view that Rishabha nath. The Yajurveda mentions the was the founder of Jainism."--Indian names of three Tirthankars Rishabhanath, philosophy, Vol. V, P. 288.

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