Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 15
________________ पंच परमेष्ठी और णमोकार मंत्र प्राचीनतम उल्लेख हाथीका शिलालेख में प्राप्त होता है । उसकी प्रथम पंक्ति है --"नमो अरहंतानं ॥नमो समिधानं ।। ।" श्री बी० ए० स्मिथ ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ "Early History of India" मे इम शिलालेख का निर्माता कलगाधिपति सम्राट् खारवेल को ईसा से १७० वर्षमाना है। जहाँ तक निति साहित्य का सम्बन्ध है पाचार्य दन्त भूतनिका पण्डान समे पहला ग्रंथ है, जिसका श्रारम्भ णमोकार मन्त्र के मंगलाचरण से हमा है । पट्खण्डागम श्री वीरसेनाचार्य की संस्कृत टीका के माथ, डा० श्री हीरालाल जैन के सम्पादन में, अमरावती से वि० सं० १९६६ में प्रकाशित हो चुका है। भूतबलि का समय ईसा की दूसरी शताब्दी माना जाता है । णमोकार मन्त्र अपूर्वशक्ति का प्रतीक है। उसके उच्चारण में, ध्यान मे दहनोविक वैभव तो मिलते ही है. पारलौकिक गिद्धि भी प्राप्त होती है। भद्रबाहु ने 'उबसमाहर स्तोत्त' में लिखा है - 'सम्मते लढे चितामणिकपवायवम्भहिए। पार्वति प्रविण जीवा परामरं ठाणं || तुह अर्थ - पचनमस्कार मंत्र से चिन्तामणि और कल्पवृक्ष से भी अधिक महत्वशाली सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है, जिसके कारण जीव को मोक्ष मिलता है । श्राचार्य कुन्दकुन्द को विश्वास है कि मंत्र से भव-भव सुख प्राप्त होता है। उनका तात्पर्य केवल इहलौकिक सुख से ही नही अपितु पालौकिक सुख से भी है। उनका कथन है हा सिद्धार्थारिया उवझाया साहू पंचपरमेट्टि । एवे पंच गोवारा भवे भवे मम ।। अर्थ - अर्हन्त, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु अर्थात् पचपरमेष्ठि मुझे भव-भव मे सुख देवेभय भव लगा देने से इहलौकिक सुख स्वतः ही प्राभासित होता है और सुख का वास्तविक अर्थ तो प्रात्मब्रह्म का परमानन्द है ही। प्राचार्य देवनन्दि पूज्यवाद ने णमोकार मन्त्र को प्रथम कहा। उन्होंने स्पष्ट स्वीकार किया है कि यह सब पापों को नष्ट करने वाला है और जीवों का कल्याण करने में पूर्ण रूप से सक्षम है- एष पंचनमस्कारः सर्वपापप्रणाशिनः । मंगला व प्रथमं मंगलं भवेत् ॥ #t मुनि वादिराज (११वीं शताब्दी विक्रम) ने एकीभाव स्तोत्र में लिखा है- "जब पापाचारी कुत्ता भी मोकार मंत्र को सुनकर देव हो गया, तब यह निश्चित है कि उस मंत्र का जाप करने वाला इन्द्र श्री को प्राप्त कर ही सकता है।" श्री जिनप्रभरि ने पचपरमेष्ठिनमस्कार कल्प" मे लिखा है- 'इस मंत्र की प्राराधना करने वाले योगिजन त्रिलोक के उत्तम पद को प्राप्त कर लेते है । यहाँ तक हो नहीं. महस्रों पापो का सम्पादन करने वाले पौर को जन्तुओं की हत्या करने वाले तियंच भी इस मन्त्र की भक्ति से स्वर्ग में पहुंच जाते हैं। उनका कथन एतमेव महायन्त्रं समाराध्येह योगिनः । त्रिलोक्वाऽपि महोयन्तेऽधिगताः परमपदम् ॥ कृत्वा पापसहस्राणि हत्वा जन्तुशतानि च । प्रमं मन्त्र समाराध्य तियंचोऽपि दिवंगतः || जनावापों ने समोकार मन्त्र की गति को देवता कहा है। उसमें आध्यात्मिक श्राधिभौतिक और श्राधिदैविक सोनो ही प्रकार की शक्तियाँ समिति है वे मोह के दुर्गमन को रोकने मे पूर्ण रूप से समर्थ है स्तम्भं दुर्गमनं प्रति प्रयततो मोहस्य सम्मोहनम् । पापात्पंचनमस्त्रियामयी सपना देवता ।। इस मंत्र की विशेषता है पाच को एक स्थान पर समवेत करना | पाच का समवेत रूप हो मन्त्र है। यदि इनमें से एक भी हटा दिया जाये तो यह मन्त्र शक्तिहीन हो जायेगा। यह श्रात्मशुद्धि का एक सम्गुम्फित हर है। सीढ़ी के क्रम में यदि एक भी कम कर दी जाये तो ऊपर जान का मार्ग भंग हो जाता है। इस सीढ़ी मे पाच श्राधार है और पाचो प्रनिवार्य । ग्रहन्त और सिद्ध जितने अनिवार्य है उतन ही साधु भीम की दृष्टि सभी समरून मे मूल्यवान है, अर्थात् मन्त्र की सिद्धि पाचो के राम रूप में है, पृथनकरण में नहीं यहाँ किसी एक म ब्रह्मक्ति केन्द्रित नहीं है । "एको ब्रह्म" से ही लोक में

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