Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 13
________________ मालवा के परमार नरेश पोर मन धर्म के रूप में मौजूद हैं जिनमें प्राचीन जैन मन्दिर की जगतो की भांति यद्यपि वे विविध प्रकार की नहीं हैं, परन्तु वे एवं अधिष्ठान पर पुननिर्मित जैन मन्दिर एवं उसके लेख युक्त है। इन प्रतिमानो में प्रादिनाथ, श्रेयांसनाय, प्रहाते मे रखी हई प्राचीन जैन प्रतिमायें एवं स्थापत्यखड धर्मनाथ, शातिनाथ, नेमिमाथ, नमिनाथ एव महावीर की है। स्थापत्य विद्या एव मूलि शिल्प के आधार पर प्राचीन प्रतिमाये उल्लेखनीय है। जैन मन्दिर लगभग १३वी शदी का प्रांका जा सकता है। मध्य प्रदेश के उज्जैन जिले की महीदपुर तहसील से इस स्थान का सम्बन्ध धाराधिपति भोज द्वारा निर्मित उस पूर्व दिशा में १५ कि० मी० दूर झारड़ा ग्राम अपने जनाप्राचीन जैन मन्दिर से रहा होगा जो भोजपुर में प्राज भी वशेषों के कारण कला जगत में अधिक प्रसिद्धि प्राप्त कर पुननिमित अवस्था मे खड़ा है। चुका है। यहां से उपलब्ध वि० स० १२०८ के अभिलेख भोजपुर से लगभग १० किलोमीटर की दूरी पर वाली रोहिणी की एक कलात्मक प्रतिमा २' ५' ऊंची सावरी नामक ग्राम है। यहा परमारकालीन मदिरों के और १७" चौड़ी है। १६ विद्या देवियों में रोहिणी कई स्थलों पर अवशेष उपलब्ध है। इन्हीं स्थलो मे एक प्रसिद्ध है। प्रतिमा का वाहन गाय है। अतः यह श्वेताम्बर समह जैन मन्दिर के अवशेष का है जो ग्राम की पश्चिम परम्परा में निर्मित है। चतुभजी रोहिणी की इस प्रतिमा दिशा पर कुछ ही दूरी पर है । मदिर के अवशेषों में मात्र के ऊर्ध्व वाम हस्त में कलश एवं दायें हाथ में शख, जगती शेष रह गई है। इसी जगती पर यत्र-तत्र बिखरी प्रधो वाम हस्त में कमल एवं चौथा हाथ भग्न है । प्रतिमा हई लगभग दो दर्जन जैन प्रतिमायें पड़ी है जिसमे सुप्राव. एक विशिष्ट मूर्तिकला का उदाहरण प्रस्तुत करती है। भाष जैन चतुष्टि का, ऋषभनाथ, गोभेद अम्बिका, इसमें वाहन के प्राधार पर जैन देवी श्वेताम्बरी है परन्त अम्बिका तथा अन्य तीर्थंकरों की प्रतिमायें सम्मिलित है। आयुध के प्राघार पर दिगबर है। मभवतः यह परमार पतिमा विज्ञान की दष्टि से वी सती का वंश के महान यशस्वी सम्राट् राजाधिराज भोज के समय पाका जा सकता है। संस्थापित धार्मिक समन्वय के कर्तृत्व द्वारा प्रभावित थी। नेगावर से ३३ मील पश्चिम की पोर एव इन्दौर देवी की शरीर यष्टि विशुद्ध रूप से परमार शिल्प से मन प्राणित है। से ४६ मील पूर्व में स्थित विजयवाड़ा में महान जैन मन्दिर पूर्ण ध्वम्तावस्था में है। इसमें तीन भीमाकार यहां से उपलब्ध दूसरी महत्वपूर्ण प्रतिभा यश्वरी की है। परमार मतिकला में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ दिगम्बर जैन प्रतिमाएं सर्वाधिक अाकर्षक हैं। इनमें से की शासन देवी चक्रेश्वरी परमार मूर्तिकला में विशेष रूप एक के पादपीठ पर संवत १२३४, तदनुसार ११७७ ई० उत्कीर्ण है। से अकित मिलती है । भारड़ा से उपलब्ध चक्र श्वरी की इस प्रतिमा में देवी गसड़वाहना और अष्टभुजी है। परमार गजदश के उत्कर्ष काल में मालवा के लोगों प्रतिभा के चक्र, पाश, वाण, वरद, प्रकुश, वच्च प्रायुध ने भवन निर्माण सम्बन्धी कितनी दक्षता प्राप्त की थी, यह सुस्पष्ट है, एवं दो हाथों के आयुध भग्न है । इस प्रतिमा उपुक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है। इसी काल में पर प्रकित अभिलेख अस्पष्ट है । अभिलेख के प्राधार पर जैन शिल्प कला का भी बहुत उत्कर्ष हुआ। विवेच्य युगीन इसका काल १३वी शताब्दी ई० निर्धारित किया जा जैन प्रतिमायें अनेक स्थलों से उपलब्ध हुई है। भोजपुर सकता है। से तीन मील की दूरी पर पाशापुरी नामक ग्राम में सोलह विद्या देवियो में प्रसिद्ध अच्युता की यहा से शातिनाथ की प्रतिमा सुरक्षित है । सतपुड़ा पर्वत श्रेणियों उपलब्ध काले स्लेटी प्रस्तर की इस प्रतिमा में देवी को के मिरे के निकट निमाड़ के मैदान में स्थित ऊन नामक अश्वारूत दिखाया गया है । यह प्रतिमा ५'४" लंबे एव ग्राम में स्थित जैन मन्दिरो मे जैन धर्म की भनेक सुन्दर ३'७" चौड़े पाषाण फलक पर उभारी गई है। दो हायो मूर्तियां स्थापित है। केन्द्रीय संग्रहालय, इंदौर में परमार से नमस्कार मुद्रा की प्रज्ञप्ति व दाये हाथ में खड्ग तपा युगीन भनेक जैन प्रतिमाये सुरक्षित है। ब्राह्मण मूर्तियो (शेष पृष्ठ १३ पर)

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