Book Title: Anekant 1979 Book 32 Ank 01 to 04
Author(s): Gokulprasad Jain
Publisher: Veer Seva Mandir Trust

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Page 8
________________ ४, वर्ष ३२, कि०१-२ अनेकान्त हा नहीं रहता। संप्रति, मागम संत-संवादो स्वरों में से एक- मण मिलियउ परमेसर हो, परमेसह जिमणस्य। एक का पर्यवेक्षण प्रस्तुत है। विणि वि समरसिहइ रहिय पुज्जु चडावउ कस्स ।। मन परमेश्वर से तथा परमेश्वर मन से मिलकर सम(१) परतत्व संबन्धी वैचारिक या सैद्धान्तिक पक्ष - रस हो जाता है और जब यह सामरस्य हो गया, तब त ऊपर यह स्पष्ट कहा जा चुका है कि जैन धारा मे का विलय भी जाता है । द्वंत का विलय हो जाने से कौन मात्मा ही मुक्त दशा में परमात्मा है, वह अनेक है और पूजक और कौन पूज्य ? कौन पाराधक और कौन मनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, पनन्त सुख और अनन्त वीर्य आराध्य ? फिर तो का भण्डार है । अशुद्ध दशा में उनके ये गुण कमों से ढके ___"तुभ्यं मां नमो नमः" रहते है। पर इस मान्यता के साथ-साथ उक्त ग्रंथों मे ऐमी की स्थिति प्रा जाती है। इस तरह सामरस्य की कई बातें पाई जाती हैं, जो नि.सन्देह प्रागमिक धारा अनेकत्र चर्चा उपलब्ध हो जाती है। है की है । संतों की भांति जैन मनियों के भी वे ही तात्रिक देह महेली एह बढ़ तउ सत्तावइ ताम। ग्रंथ स्रोत हैं । बौद्धों की भांति जैनो पर भी यह प्रभाव चित्तु णिरंजणु परिण सिहु समरसि होइ ण जाम ॥ दृष्टिगत होता है। प्रागमिकों की भांति जैन मनियो ने। लक्ष्य के रूप मे इमी 'सामरस्य' की उपलब्धि भी भी परमात्म भाव को 'समरस' ही नहीं कहा है, 'शिव उन्हे इष्ट है । संतों ने जिन मन्मोन्मती दशा की ओर शक्ति' का समरूप या पद्वयात्मक रूप भी कहा है। मनि हकेत किया है--उसका पूर्वाभास इन लोगो मे भी रामसिंह ने कहा है (पाहु दोहा) उपलब्ध है-- सिब विगु सन्ति वावरह, सिर पुणु सन्ति विहीण। तुइ बुद्धि तड़त्ति जहि मण न वणहं जाद। बोहि मि जाहिं सयल जग, बुज्झइ मोह विण ॥ सो सामिय उ एसु कहि अणहि देहि काइ॥ इस सामरस्य की उपलब्धि हो जाने पर बुद्धि का शक्तिरहित शिव कुछ नहीं कर सकता और न तो पाहंकारिक 'अध्यवसाय' तथा मन की संकल्प विकल्पात्मक शक्ति ही शिव का प्राधार ग्रहण किए बिना कुछ कर वतियां समाप्त हो जाती है । प्रागम संवादीसंतो के स्वर सकती है। समस्त जगत् शिव-शक्तिमय है । जड़ परमाणु में अन्य देवताबों की उपासना से विरति तथा उक्त अपनी समस्त संरचना में गतिमय था, सस्पंद है-जो गंतव्य की उपलब्धि ही स्वामी की प्रोर से इन्हे निदिष्ट है । शक्ति का ही स्थूल परिणाम है। दूसरी पोर, जीवन भी कही-कहीं तो संतों और इन जैन मुनियो की उक्तियां एकडी० एन० ए० तथा भार० एन० ए० के संयुक्त रूप में दूसरे का रूपान्तर जान पड़ती है। नमक और पानी के दयात्मक है । एकत्र वही शक्ति शिव ऋणात्मक धनात्मक एक ही दृस्टान्त से जो बात रामसिंह कहते है, वही कबीर अवयव हैं जो अपनी निरपेक्ष स्थिति मे अद्वयात्मक है। भी। संत साहित्य के अन्तर्गत राधास्वामी साहित्य तथा गुरु जिमि लोण विलिज्जह पाणियह चित्त बिलिज्ज। नानक की 'पुराण संगत्री' मे भी इस सिद्धान्त का वृहद् समरसि वइ जीवहा काह समाहि करिज्ज? रूप से निरूपण है। परतत्व या परमात्मा को समरस ठीक इसी की प्रतिध्वनि कबीर मे देखेंकहना द्वयात्मकता सापेक्ष ही तो है। अभिप्राय यह कि मन लगा उनमन् सौ उनमन मनहि विलग। मूल धारणा मागम सम्मत है-वही इन जैन मुनियो की लूंण विलगा पांणपा, पाणी लण विलग ।। उक्तियों में तो प्रतिबिम्बित है ही, सतों ने भी 'सुरत' (२) वासना दमन की जगह वासना शोषन पोर तथा 'शब्द' के द्वारा तांत्रिक बौद्ध सिद्धो ने 'शून्यता' और उसकी सहजानंद मे स्वाभाविक परिणति के संकेत'करुणा' तथा 'प्रज्ञा' और 'उपाय' के रूप मे उसी धारणा बौद्ध सिद्धो के समकालीन इन जैन संतो मे भी चरको स्वीकार किया है। अन्यत्र 'समरसीकरण' की भी मावस्था के लिए 'सहजानंद' शब्द का किया गया प्रयोग उक्तियां है मिलता है। संतों ने शतशः, सहस्रसः 'सहज' की बात कही

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