Book Title: Agam 30 mool 03 Uttaradhyayana Sutra Sthanakvasi
Author(s): Amarmuni
Publisher: Padma Prakashan

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Page 626
________________ सचित्र उत्तराध्ययन सूत्र कर्मों के रस - विशेष - अनुभाग सिद्धों के अनन्तवें भाग जितने होते हैं और सभी अनुभागों में प्रदेशों के अग्र - परमाणुओं का परिमाण सभी ( भव्य - अभव्य जीवों से भी) से अधिक है ॥ २४ ॥ त्रयस्त्रिंश अध्ययन [ 474] The number of potency defining clusters of karmic particles (anubhaag) of a specific karma is infinite fraction of the number of perfected souls (Siddhas) and the number of ultimate particles in all such potency defining clusters is more than all the worldly souls (destined to be liberated or not; bhavya-abhavya). (24) तम्हा एएसि कम्माणं, अणुभागे वियाणिया । एएसिं संवरे चेव, खवणे य जए बुहे ॥ २५ ॥ -त्ति बेमि । इसलिए इन कर्मों के अनुभागों को जानकर बुद्धिमान - तत्त्वज्ञानी साधक इन कर्मों के संवर और क्षय करने में प्रयासरत बने ॥ २५ ॥ - ऐसा मैं कहता हूँ । Therefore knowing all these potency defining clusters of karmic particles a wise aspirant should exert to stop their inflow and destroy them. (25) -So I say. विशेष स्पष्टीकरण गाथा ३ - समास का अर्थ संक्षेप है। संक्षेप में आठ कर्म हैं, इसका अभिप्राय है कि वैसे तो जितने प्राणी हैं, उतने ही कर्म हैं, अर्थात् कर्म अनन्त हैं। यहाँ विशेष स्वरूप की विवक्षा से आठ भेद हैं। गाथा ६–सहज रूप में आने वाली निद्रा है। गहरी और कठिनाई से टूटने वाली निद्रा - निद्रा है। बैठे-बैठे सो जाना प्रचला निद्रा है। चलते हुए भी सो जाना प्रचलाप्रचला निद्रा है । स्त्यानर्द्धि का अर्थ है - जिसमें सबसे अधिक ऋद्धि अर्थात् गृद्धि का स्त्यान है, उपचय है, वह निद्रा । इसमें वासुदेव का आधा बल आ जाता है, प्रबल राग-द्वेष वाला प्राणी इस निद्रा में बड़े-बड़े असंभव जैसे कार्य कर लेता है और उसे भान ही नहीं होता कि मैंने क्या किया है ? गाथा ९ - सम्यक्त्वमोहनीय शुद्धदलिकरूप है, अतः उसके उदय में भी तत्वरुचिरूप सम्यक्त्व हो जाता है। पर, उसमें शंका आदि अतिचारों की मलिनता बनी रहती है। मिथ्यात्व अशुद्धदलिकरूप है, उसके कारण तत्व में अतत्व रुचि और अतत्व में तत्व रुचि होती है । सम्यक्मिथ्यात्व के दलिक शुद्धाशुद्ध अर्थात् मिश्र हैं। गाथा १० - "नोकषाय" में प्रयुक्त "नो" का अर्थ "सदृश" है। जो कषाय के समान हैं, कषाय के सहवर्ती है, वे हास्य आदि नोकषाय हैं। गाथा ११ - एक बार उपयोग में आने वाले जल, आहार आदि भोग हैं। बार-बार उपयोग में आने वाले वस्त्र, अलंकार, मकान आदि उपभोग हैं।

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