Book Title: samaysar
Author(s): Manoharlal Shastri
Publisher: Jain Granth Uddhar Karyalay

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Page 540
________________ अधिकारः ९] समयसारः। ५२७ ___ न श्रुतं ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानश्रुतयोर्व्यतिरेकः । न शब्दो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानशब्दयोर्व्यतिरेकः । न रूपं ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानरूपयोर्व्यतिरेकः । न वर्णो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानवर्णयोर्व्यतिरेकः । न गंधो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानगंधयोर्व्यतिरेकः । न रसो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानरसयोर्व्यतिरेकः । न स्पर्शो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानस्पर्शयोतिरेकः । न कर्म ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानकर्मणोर्व्यतिरेकः । न धर्मों ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानधर्मयोर्व्यतिरेकः । नाधर्मो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानाधर्मयोर्व्यतिरेकः । न कालो ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानकालयोर्व्यतिरेकः । नाकाशं ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानाकाशयोर्व्यतिरेकः । नाध्यवसानं ज्ञानमचेतनत्वात् ततो ज्ञानाध्यवसानयोर्व्यतिरेकः । इत्येवं ज्ञानस्य सर्वैरेव परद्रव्यैः सह व्यतिरेको निश्चयसाधितो भवति । अथ जीव एवैको ज्ञानं चेतनत्वात् ततो ज्ञानजीवयोरेवाव्यतिरेकः, नच जीवस्य स्वयं ज्ञानत्वात्ततो व्यतिरेकः कश्चनापि रिणामिकभावस्तु द्रव्यरूपः । जीवपदार्थो हि न च केवलं द्रव्यं, न च पर्यायः, किंतु परस्परसापेक्षद्रव्यपर्यायधर्माधर्मभूतो धर्मी । तत्रेदानीं केन धर्मेण मोक्षो भवतीति विचार्यते-केवलज्ञानं तावत्फलभूतमने भविष्यति । अवधिमनःपर्ययज्ञानद्वयं च रूपिष्ववधेः। तदनंतभागे मनःपर्ययस्य इति वचनात् मूर्तविषयत्वादेव मूर्तः मोक्षकारणं न भवति । ततः सामर्थ्यादेव बहिर्विषयमतिज्ञानश्रुतज्ञान विकल्परहितत्वेन स्वशुद्धात्माभिमुखपरिच्छित्तिलक्षणं निश्चय त्यागकर इसका अभ्यास करना । उपयोगको ज्ञानमें ही ठहराना । सो जैसा शुद्धनयकर अपने स्वरूपको सिद्धसमान जाना श्रद्धान किया वैसा ही ध्यानमें लेके एकाग्र चित्तको ठहराना बार बार इसीका अभ्यास करना । सो यह देखना अप्रमत्त दशामें होता है। सो जहांतक ऐसे अभ्याससे केवलज्ञान उपजे वहांतक यह अभ्यास निरंतर रहे। यह देखना दूसरा प्रकार है। यहांतक तो पूर्णज्ञानका शुद्ध नयके आश्रय परोक्ष देखना है । और तीसरा यह है कि केवल ज्ञान उपजे तब साक्षात् देखना होता है। उससमय सब विभावोंसे रहित हुआ सबको देखने जाननेवाला ज्ञान होता है । यह पूर्ण ज्ञानका प्रत्यक्ष देखना है । यह ज्ञान है वही आत्मा है । अभेदविवक्षामें ज्ञान कहो या आत्मा कहो कुछ विरोध नहीं जानना ॥ अब इस अर्थका कलशरूप २३५ वां काव्य कहते हैंअन्येभ्यो इत्यादि । अर्थ-यह ज्ञान उसतरह अवस्थित हुआ है जैसे इसकी महिमा निरंतर उदयरूप तिष्ठे, प्रतिपक्षी कर्म न रहे। कैसा है ? अन्य परद्रव्योंसे जुदा अवस्थित हुआ है, अपनेमें ही निश्चित है जुदे ही वस्तुपनेको धारता हुआ है अर्थात् वस्तुका स्वरूप सामान्य विशेषात्मक है सो ज्ञानने भी सामान्य विशेषात्मकपनेको धारण

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