Book Title: Trishashti Shalaka Purush Charitra Part 4
Author(s): Ganesh Lalwani, Rajkumari Bengani
Publisher: Prakrit Bharti Academy
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जब कि तुम निश्चिन्त होकर सो रहे हो।' (श्लोक ४२-४५)
सत्यकि बोला-'प्रिये, तुमने जो कुछ कहा वह सत्य है । अब तक मुझे सत्यभामा के योग्य वर मिल नहीं सका था। यह ब्राह्मण कपिल जो कि देखने में भी सुन्दर, प्रतिभासम्पन्न और सदाचारी है यह सत्यभामा के लिए उपयुक्त है।' जम्बूका भी इससे सहमत हो गयी। अतः एक शुभ दिन सत्यकि ने कपिल के साथ विधिवत् सत्यभामा का विवाह कर दिया। नगरवासियों द्वारा भी सत्यकि की तरह ही सम्मानित होकर कपिल सुशीला सत्यभामा के साथ यौवन सुख भोग करने लगा। इसे तो सत्य कि से भी अधिक सम्मान हमें देना चाहिए ऐसा सोचकर नगरवासी उसे विशेष दान-दक्षिणा देने लगे। इस प्रकार सदाचारी ब्राह्मण की तरह रहकर कपिल क्रमशः सद्गुणी के साथ साथ धनवान भी हो गया। (श्लोक ४६-५१)
वर्षाकाल में एक रात कपिल एक नाटक देखने गया । वहाँ रात्रि अधिक हो गयी। लौटते समय जब वह आधे रास्ते तक आया तो जोर से वर्षा होने लगी। सूचिभेद्य अन्धकार में कोई उसे नहीं देखेगा सोचकर कपिल ने अपने पहने हुए वस्त्रों को खोलकर बगल में दबा लिए और घर आने पर घर के द्वार पर वस्त्र पहन लिए। पति के वस्त्र जल में भीग गए हैं ऐसा सोचकर सत्यभामा पति के पहनने के लिए अन्य वस्त्र ले आयी । कपिल बोला, 'तुम क्या पागल हो, देखो मन्त्र बल से मेरे वस्त्र बिल्कुल भीगे नहीं है।' सत्यभामा ने जब पति की समस्त देह भींगी हुयी और कपड़ों को सूखा देखा तो -मन ही मन सोचने लगी यदि मंत्र बल से उसने अपने वस्त्रों को सूखा रखा तो शरीर को सूखा क्यों नहीं रखा ? निश्चय ही वह नग्न होकर घर लौटा है। इस व्यवहार से लगता है मेरा पति हीन कूल जात हैं। प्रतिभाशाली होने के कारण श्रवण मात्र से वेद ज्ञान प्राप्त कर लिया है। ऐसा सोचकर वह अपने पति के प्रति विराग सम्पन्न हो गयी और एक क्रीतदासी की तरह उसका जीवन दूर्वह हो गया।
(श्लोक ५२-६०) उधर धरणीजट दरिद्र हो गया। कपिल धनी हो गया है सुनकर वह धन के लिए उसके पास आया। कपिल ने उसके पैरों को धोकर सादर अभ्यर्थना की। साधारण अतिथि का ही जब सम्मान किया जाता है तब पिता की तो बात ही क्या ? फिर जब