Book Title: Narbhavdrushtantopnaymala
Author(s): Jinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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________________ // 8 // अथ कूर्मनामा अष्टमो दृष्टान्तः // किल कत्थइ वणगहणे अणेगजोयणसहस्सविच्छिण्णो / आसि दहो अइगुहिरो अणेगजलयरकुलाइण्णो // 1 // भावार्थ:-कइएक गहनवनमां अनेकहजारयोजन विस्तीर्ण (विस्तार) अने अत्यंत उंडो तेमज अनेक जलचर (पाणीअंदर चालवावाला मत्स्यादि) प्राणीओथी व्याप्त. एक द्रह हतो // 1 // अइबहलनिविडसेवाल-पडलसंछाइओवरिमभागो / माहिसचम्मेणेव सो अवणद्धो भाइ सम्वत्थो // 2 // भावार्थ:-जे गाढ जाडा सेवालना पडलथी उपरना भागमां ढंकायेलो हतो तेथी जाणे चोमेर पाडाना चामडाथी ढंकायेल न होय ? तेवी रीते जणातो हतो // 2 // केण वि कालवसेण य चटुलग्गीवो दुलो परिभमंता / संपत्तो उवरितले गीवा य पसारिया तेण // 3 // भावार्थ:-कोइ वखते चंचलडोकवालो एक काचबो भमतो भमतो उपरना भागमां तरी आव्यो अने डोक पसारी (फेलावी) // 3 // सेवालपडलच्छिदं अहसमए तंमि तत्थ संजायं / . दिट्ठो तेण मयंको पडिपुण्णो कोमुइ निसाए // 4 //
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