Book Title: Narbhavdrushtantopnaymala
Author(s): Jinendrasuri
Publisher: Harshpushpamrut Jain Granthmala
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________________ // 9 / / अथ युगशमिलानामा नवमो दृष्टान्तः // पढमो लवणसमुद्दो जोयणदुगसयसहस्सविच्छिण्णो / मित्तुव्व जंबूदीवं बाढमालिंगसंठियो सययं // 1 // भावार्थः-आ तिछीलोकमां बे लाख योजननो लवणनामनो प्रथम समुद्र छे, जे मित्रनी पेठे जंबूद्वीपने आलिंगी निरंतर रहेलो छे / / 1 / / परिही तिलक्खसोलस-सहस्स सगबीसवुसयजोयणयं / 'तिगउअडवीसधणुसय-साहियमखंगुलं चऊद // 2 // __ भावार्थ:-तेनी. प्रारंभमां त्रणलाख सोलहजार बसो सत्ताबीस (316227) योजन अने त्रण गाउ, एकसो अट्ठावीस (128) धनुष्य अने साडातेर अंगुल प्रमाण परीधि छे // 24 // नवलक्खा अडयाला सहस्स छसयाई गोयणाई तहा / तेसीइ उवरि जोयण पमाणपरिही तहा मज्झे // 3 // . ___ भावार्थ:-तेमज नवलाख, अडतालीसहजार छसोने त्यासी ( 948683 ) योजन प्रमाण लवणसमुद्रना मध्यभागमा परिधी छे // 3 // - 1. अडवीसाहियधणुसय इत्यपि पाठः कचित् प्रत्यन्तरे दृश्यते स चायुक्तत्वात् त्रिक्रोशसबंधिपाठस्याऽनुपलम्भान्न गृहीत इति
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