Book Title: Nandanvan Kalpataru 2000 00 SrNo 03
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 20
________________ दुन्दुभिः। (वैतालीयम) त्वयि भक्तिभरान्वितैः सुरै - र्विहितो दुन्दुभिनाद एष नः। विमलाशय ! नाशयत्विहाऽष्टविधं मंक्षु प्रमादविद्विषम् ॥ ११॥ छत्रत्रयम्। (वसन्ततिलका) रत्नत्रयं किमिव मूर्तिमदेतदस्ति. छत्रत्रयं विशददिव्यमयूखधाम ! मूर्ध्नि स्थितं त्रिविधतापहरं नराणां, यस्य, प्रणौमि विमलं विमलं जिनं तम् ।। १२॥ (अनुष्टुप) अत्यद्भुतप्रभावेन,भाविताशेषभूतलम् । कृपाकल्पद्रुमं भक्त्या,नमामो विमलं जिनम् || १३|| (आर्या) आचार्यधर्ममूर्ति-सूरीन्द्ररचलगणविहायोऽङ्कः । विहिताऽञ्जनशलाका,प्रतिमा विमलप्रभोः पूर्वम् ॥ १४॥ (आर्या) अन्याश्चाऽपि चतुर्दश, प्रतिमाः काश्चिन्नवाश्चै प्रत्नाश्च । अहम्मदावादपुरे, लालाभाईप्रतोलिकामध्ये ॥ १५॥ (आर्या) आमूलं जीर्णोद्धत-जिनालये विमलनाथजिनराजः। राजन्ति भव्य राजि-सुपूजिता इह प्रमोदप्रदाः ।। || १६ ॥ (त्रिभिर्विशेषकम्) Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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