Book Title: Nandanvan Kalpataru 2000 00 SrNo 03
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti

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Page 29
________________ १४ किञ्च ॥ ३५॥ तीर्थस्य सुव्यवस्था-कारकमस्तीह चारुसत्तन्त्रम् । भाविकजनदत्तधनै-स्तेनाऽत्र विनिर्मितं सुभगम् यात्रिकभुवनं भोजन-सदनं चोपाश्रयद्विकं सुभगम् । श्रीनन्दनसूरीणां मूर्तियुता सुगुरुकुलिका च || ३६॥ यावचन्द्रदिवाकर- मेतत्तीर्थं तथैव जिनभुवनम्। जयताज्जगति जनानां कर्मक्षयहेतु भवतु तथा ॥ ३७॥ श्रीनन्दनसूरीणा-मन्तेवासी प्रशस्तिकामेताम् । सूर्योदयसूरिशिशुः शीलेन्दू रचितवानिति शम् शुभं भूयात् श्रीश्रमणसंघस्य ॥ शिवमस्तु सर्वजगतः ।। श्रीः ॥ || ३८॥ श्रेयान् स देशो नो यत्र श्रूयन्ते दुर्जनोक्तयः॥ हैमवचनामृतम्॥ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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