Book Title: Nandanvan Kalpataru 2000 00 SrNo 03
Author(s): Kirtitrai
Publisher: Jain Granth Prakashan Samiti
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(वसन्ततिलका)
पुष्पवर्षणम्। देव ! त्वदीयसमवासरणाचलायामस्वप्नवर्षितमनोरमपुष्पराशेः । भूयादपायसुरभीतरवासराशिनाशी नृणां विमलनाथ ! विभो ! सुगन्धः
॥६॥
(हरिणी)
दिव्यध्वनिः। प्रलयजलभृद्ध्वानन्यक्कृद्विराजति सद्ध्वनिस्समवसरणे दिव्यो भव्यो विभो ! तव मञ्जुले। सकलभविकस्फारागार ! द्रुतं विमलप्रभो !, दुरितदनुजस्तं च श्रुत्वा प्रगच्छति दूरतः
॥७॥
(आर्या)
चामरम्। धवलिमपरास्तशशधर- किरणाभ्यां चारुचामरवराभ्याम् । अनिशं वीज्यमानो ददातु न : शं विमलजिनराट्
॥८
॥
(आर्या)
सिंहासनम्। नानारत्नमणीगण-विभूषिते भासुरे सुरेशकृते। सिंहासन उपविष्टः,पुनातु नो विमलनाथजिनः
|| ९||
(आर्या)
भामण्डलम्। नमदाखण्डलमण्डल ! दृष्ट्वा भामण्डलं तवोर्जस्वि। मिहिरं स्मरन्ति भव्या ध्वस्तध्वान्तं प्रकाशकरम् ।
॥ १०॥
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