Book Title: Kalpasutram
Author(s): Kanakvimalsuri
Publisher: Muktivimal Jain Granthmala

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Page 451
________________ श्रो ऋषभ चरित्रभू श्री कल्पमुक्तावल्या // 421 // ___ श्रीजैनशासनपयोजरविप्रभेव, मान्याऽभवन्मुनिगुणास्थविरावलीयम् ॥छायाऽधुना विमलरङ्गसरिश्वरेण, गर्धन सर्वसुखदा विशदाऽभिचक्रे // 1 // // इति स्थविरावली संपूर्णा // इति श्री तपागच्छनभोनभोमणि शासनसम्राइ जङ्गमयुगप्रधान कनकाचल तीर्थपोडशीयोद्धारक महाक्रियोद्धारक सकलभट्टारकाचार्यश्रीमदानन्दविमलसूरीश्वरपट्टपरम्परागत तपोनिष्टसकलसंवेगिशिरोमणि पंन्यासदयाविमलगणिशिष्यरत्नपण्डितशिरोमणि पंन्याससौभाग्यविमलगणिवरपादारविन्दचन्चरीकायमाणविनेय सकलसिद्धान्तवाचस्पतिअनेकसंस्कृतग्रन्थप्रणेता पंन्यासमुक्तिविमलगणिविरचितकल्पमुक्तावलिव्याख्यायां स्थविरावलिसहितं अष्टमं व्याख्यानं समाप्तमिति // 421 //

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