Book Title: Kalpasutram
Author(s): Kanakvimalsuri
Publisher: Muktivimal Jain Granthmala

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Page 482
________________ श्री कल्पमुक्तावल्यां [452 // श्री समाचारि दक्षतया नु भुक्ता पाण्डलस्य च दौलदा स्याद् , दोष मू-पा-से किमाहु मंते 1 इच्छा परो अपरिग्णए भुजिज्जा इच्छा परो न भुंजिज्जा // 14 // 41 // व्याख्या-अत्र शिष्यः पृच्छति-तत् कुतो भदन्त इति पृष्टे गुरुराह-इच्छा चेदस्ति तदा परोऽपरिज्ञापितः यदर्थ आनीतं स भुञ्जीत इच्छा न चेत्तदा न भुञ्जीत प्रत्युतैवं वदति केनोक्तमासीत् आनीतमस्ति त्वयका च किं त, दिच्छां विना दक्षतया नु सुंक्ते // चाजीर्णबाधा सुतरां तदा स्याद् , दोषः परिष्ठापनके विशेषात् // 1 // ॥कुतः।। स्थण्डिलस्य च दौर्लभ्या, द्वर्षासु भद्र ? सर्वतः, आनेयं परिपृच्छयातो, येन दोषो न जायते // 2 // मृ-पा-वासावास पज्जोसवियाण नो कप्पई निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा उदउल्लेण वा ससिणिद्रेण वा कारण असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा आहारित्तए // 42 // __ व्याख्या-चतुर्मासकं स्थितानां नो कल्पते साधूनां साध्वीनाश्च-उदकाइँण गलबिन्दुयुतेन तथा सस्नेहेन-ईपदुदकयुक्तेन कायेन अशनादिकं 4 आहारयितुम् // (42) // . ... म्-पा-से किमाहु भंते ? सत्त सिणेहाययणा पणत्ता तं जहा-पाणी पाणिलेहा नश नहसिहा भमुहा अहरुठ्ठा, उत्तरुवा / , अह पुण एवं जाणिज्जा विगओदए मे काए छिन्नसिणेहे एवं से कप्पइ असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा आहारित्तए // 15 // 43 // व्याख्या-तत् कुतः पूज्या इति पृष्टे गुरुराह-सप्त स्नेहायतनानि-जलावस्थानस्थानानि प्रज्ञप्तानि जिनैः 67 452 //

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