Book Title: Dharmopadesh Sangraha
Author(s): Shrutdhar Purvacharya
Publisher: Vardhaman Satya Niti Harshsuri Jain Granthmala

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Page 4
________________ षमोपदेश ___ पृष्ठ पंक्ति ॥४॥ A- R कामभोगेभ्यः जनकोऽन्येद्य व्यतिकरे बहुसोवि द्विपक्षे उत्फुल्ललोचनः मोचिता अशुद्ध कामभागेभ्यः बहुसावि द्विट्पस उत्फुल्ललोवनः माचिता तदुस्तस्यै भूमृताद्यप वर्गिका संग्रम अपेक्ष्य दुष्कर्मकमुपकार मादवं जाणि অর্ড जनकाज्येद्यु व्यकरे सुहृदा घरको कुटिलालाचन माक्षः सहसात्पन्न राजान लोभस्यकस्य सैतोषाऽऽस्वाद न मुक्त प्रातःकाला श्वक RHEART भूभृताद्यप वर्णिका संग्राम घराका कुटिलालोचना मोक्षः सहसोत्पन्न राजानं लोभकस्यैकस्य संतोषाऽऽस्वादर्ज न मुक्ते प्रातःकालो RECECALCULABOURSS १२ ११ ३० ३१ दुष्कर्म नुपकार मार्दवं जोणि २२ ५ श्चके

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