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बन जाए । हम साली के साथ तो तहजीब से पेश आते हैं फिर घरवाली के साथ अकड़पन क्यों रखतें हैं। • पीठ थपथपा करके तो हम गधों और कुत्तों से भी काम ले
सकते हैं फिर नौकर या कर्मचारियों से काम लेने के लिए उसी मिठास भरे मिजाज का उपयोग क्यों नहीं करते? अरे, शाबासी की बात सुनकर हाथी तो क्या, चींटी भी पहाड़ लाँघ जाया करती है। किसी काम के लिए बड़ों को अपने पास बुलाने की बजाय हमें उनके पास जाना चाहिए। सास, पिता, गुरु या बड़े भैय्या ज़मीन पर बैठे हों तो हमें उनके सामने सोफे-कुर्सी पर नहीं बैठना चाहिए। कोई चीज़ हमें खानी-पीनी हो, तो सामने बैठे लोगों से मनुहार करने के बाद ही हमें उपयोग करना चाहिए। यह जीवन की पाठशाला का सबसे पहले सीखा जाने वाला पाठ है।
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