Book Title: Anusandhan 2012 07 SrNo 59 Author(s): Shilchandrasuri Publisher: Kalikal Sarvagya Shri Hemchandracharya Navam Janmashatabdi Smruti Sanskar Shikshannidhi Ahmedabad View full book textPage 9
________________ अनुसन्धान-५९ श्री करहेडक-पार्श्व-स्तवः आनन्दभ(क)न्द-कुमुदाकरपूर्णचन्द्रं विश्वत्रयीनयनशीतलभावचन्द्रम् । उद्दण्डचण्डमहिमारमया सनाथं नित्यं नमामि करहेटक-पार्श्वनाथम् ॥१॥ नाथ ! त्वदीयमुखमण्डलमीक्षमाणो, __ नायं जनो लवणिमापरपारमेति । पोतः प्रयत्नचलितोऽपि कदापि किं वा, यं(यद्?) गम्यते चरमसागरपुष्करान्तम् ॥२॥ कान्तं तवेश नयनद्वितयं विलोक्य कारुण्यपुण्यपयसा भरितं सरोवत् । मल्लोचने हरिणवच्चपले चिराय सन्तोषपोषमयतां भवदावतप्ते ॥३॥ कल्पद्रुमो मम गृहाङ्गणमागतोऽद्य चिन्तामणिः करतले चटितोऽद्य सद्यः । अद्याऽऽश्रिता मम पदौ सुरधेनुरेव ___ यद् भेटितोऽसि करहेटक-पार्श्वदेवः ॥४॥ सिद्धानि मेऽद्य सकलानि मनोमतानि, पापानि पार्श्वजिन ! मे विलयं गतानि । याचे न किञ्चिदपरं भवतो गभीरं ध्यानं तवाऽस्ति यदि महदि मे स धीरम्(?) ॥५॥ ॥ इति करहेटक-श्रीपार्श्वस्तवनं कृतं श्री मेरुनन्दनोपाध्यायेन ॥ श्रीवीसविहरमाणस्तवनम् भत्ति-सरोवरु ऊलटिउ जागिय हियइ जगीस । साहिब आणंदिहिं संथुणिमो विहरमाण जिण वीस ॥१॥Page Navigation
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