Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan
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276 : प्राकृत व्याकरण
'त्रैलोक्यम्' संस्कृत रूप है। इसके प्राकृत रूप 'तेल्लोक' और 'तेलोक्कं होते हैं। इनमें से प्रथम रूप में सूत्र संख्या २-७९ से 'र' का लोप; १-८४ से दीर्घ स्वर 'ऐ' के स्थान पर हस्व स्वर 'ए' की प्राप्ति; २-९७ से 'ल' वर्ण के स्थान पर वैकल्पिक रूप से द्वित्व 'ल्ल' की प्राप्ति; २-७८ से 'य' का लोप; ३-२५ से प्रथमा विभक्ति के एकवचन में अकारान्त नपुंसकलिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म्' प्रत्यय की प्राप्ति और १-२३ से प्राप्त 'म्' का अनुस्वार होकर प्रथम रूप 'तेल्लोक सिद्ध हो जाता है। द्वितीय रूप 'तेलोक्क' की सिद्धि सूत्र संख्या १-१४८ में की गई है। ।। २-९७||
तैलादो ॥ २-९८।। तैलादिषु अनादौ यथादर्शन्त्यस्यानन्त्यस्य च व्यञ्जनस्य द्वित्वं भवति॥ तेल्लं। मण्डक्को। वेइल्लं। उज्जू। विड्डा। वहुत्तं।। अनन्त्यस्य। सोत्तं। पेम्म। जुव्वण।। आर्ष। पडिसोओ। विस्सोअसिआ।। तैल। मण्डूक। विचकिल। ऋजु। व्रीडा। प्रभूत। स्त्रोतस्। प्रेमन्। यौवन। इत्यादि।।
अर्थः- संस्कत भाषा में तैल आदि अनेक शब्द ऐसे हैं जिनके प्राकत रूपान्तर में कभी-कभी तो अन्त्य व्यञ्जनका द्वित्व हो जाता है और कभी-कभी अनन्त्य अर्थात मध्यस्थ व्यञ्जनों में से किसी एक व्यञ्जन का द्वित्व हो जाता है। अन्त्य और अनन्त्य के संबंध में कोई निश्चत नियम नहीं है। अतः जिस व्यञ्जन का द्वित्व देखो: उसका विधान इस सत्र के अनुसार होता है; ऐसा जान लेना चाहिये। इसमें यह एक निश्चित विधान है कि आदि व्यञ्जन का द्वित्व कभी भी नहीं होता है। इसीलिये वृत्ति में 'अनादौ पद दिया गया है। द्विर्भाव-स्थिति केवल अन्त्य व्यञ्जन की अथवा अनन्त्य याने मध्यस्थ व्यञ्जन की ही होती है। इसके लिये वृत्ति में "यथा-दर्शनम्" "अन्त्यस्य" और "अनन्त्यस्य' पद दिये गये हैं; यह ध्यान में रहना चाहिये। जिन शब्दों के अन्त्य व्यञ्जन का द्वित्व होता है; उनमें से कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:तैलम्-तेल्ल।। मण्डूकः मण्डुक्को।। विचकिलम् वेइल्लं।। ऋजुः=उज्जू।। व्रीडा विड्डा।। प्रभूतम् वहुत्त।। जिन शब्दों के अनन्त्य व्यञ्जन का द्वित्व होता है; उनमें से कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं:-स्त्रोतम्-सोत्तं।। प्रेमन्=पेम्म और यौवनम्-जुव्वणं।। इत्यादि।। आर्ष-प्राकृत में "प्रतिस्त्रोतः" का "पडिसोओ" होता है; और "विस्त्रोतसिका" का "विस्सोअसिआ" रूप होता है। इन उदाहरणों में यह बतलाया गया है कि इनमें अनन्त्य व्यञ्जन का द्वित्व नहीं हुआ है; जैसा कि ऊपर के कुछ उदाहरणों में द्वित्व हुआ है। अतः यह अन्तर ध्यान में रहे।
'त्रैलम्' संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप 'तेल्लं' होता है। इसमें सूत्र संख्या १-८४ से दीर्घ स्वर 'ऐ' के स्थान पर हस्व स्वर 'ए' की प्राप्ति; २-९८ से 'ल' व्यञ्जन के स्थान पर द्वित्व 'ल्ल' की प्राप्ति; ३-२५ से प्रथमा विभक्ति के एकवचन में अकारान्त नपुंसकलिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'म्' प्रत्यय की प्राप्ति और १-२३ से प्राप्त 'म्' का अनुस्वार होकर 'तेल्लं' रूप सिद्ध हो जाता है। __ 'मण्डूकः' संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप 'मण्डुक्को' होता है। इसमें सूत्र संख्या २-९८ से अन्त्य व्यञ्जन 'क' को द्वित्व 'क्क' की प्राप्ति और ३-२ से प्रथमा विभक्ति के एकवचन में अकारान्त पुल्लिंग में 'सि' प्रत्यय के स्थान पर 'ओ' प्रत्यय की प्राप्ति होकर 'मण्डुक्का' रूप सिद्ध हो जाता है।
'वेइल्लं' रूप की सिद्धि सूत्र संख्या १-१६६ में की गई है। 'उज्जू' रूप की सिद्धि सूत्र संख्या १-१३१ में की गई है।
'व्रीडा' संस्कृत रूप है। इसका प्राकृत रूप 'विड्डा' होता है। इसमें सूत्र संख्या २-७९ से 'र' का लोप; १-८४ से दीर्घ स्वर 'ई' के स्थान पर हस्व स्वर 'इ' की प्राप्ति और २-९८ से अन्त्य व्यञ्जन 'ड' को द्वित्व 'ड' की प्राप्ति होकर 'विड्डा' रूप सिद्ध हो जाता है।
वहुत्तं रूप की सिद्धि सूत्र संख्या १-२३३ में की गई है।
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