Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan

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Page 413
________________ 380 : प्राकृत व्याकरण अत्तमाणो अत्ता अत्थ अत्थक्कं अत्थिओ अथिरो अदंसण अइं अदंसणं अद्दो अद्ध अनलो अनिला अन्तग्गयं अन्तप्पाओ अन्तरप्पा अन्तरं अन्तरेसु अन्तावेई वक (आवर्तमानः) चक्राकार घूमता हुआ; अप्पणयं परिभ्रमण करता हुआ; १-२७१। पु (आत्मा) आत्मा, जीव, चेतन, निज, स्व; अप्पण्ण २-५१। नपु. (अर्थ) पदार्थ; तात्पर्य; धन; १-७; २-३३ ।। अप्पमत्तो देशज (अकाण्डम्) अकाण्ड, अकस्मात् असमय; २-१७४। अप्पा वि (अर्थिकः) धनी, धनवान् २-१५९। वि (अस्थिरः) चंचल, चपल, अनित्य, विनश्वर; अप्पाणो १-१८७| अप्पुल्लं न (अदर्शनम्) नहीं देखना; परोक्ष; २-९७। अमरिसो वि (आर्द्रम्) गीला; भीजा हुआ; १-८२ अमुगो न (अदर्शनम्) नहीं देखना; परोक्ष; २-९७) अमुणन्ती पु. (अब्दः) मेघ, वर्षा; वर्ष, संवत्सर; २-७९ । अम्बं वि (अर्धम्) आधा; २-४१। अम्बिर पु. (अनलः) अग्नि; आग; १-२२८! अम्बिलं पु. (अनिलः) वायु, पवन; १-२२८। अम्मो वि (अन्तर्गतम्) अन्दर रहा हुआ; १-६०। पु. (अन्तःपातः) अन्तर्भाव, समावेश; २-७७। अम्ह पु. (अन्तरात्मा) अन्तरात्मा; १-१४। अंतरं न (अन्तरम्) मध्य, भीतर, भेद, विशेष अम्हकेरो फर्क; १-३०। अम्हकरें (अन्तरेषु) भेदों में; २-१७४ । अम्हे स्त्री. (अन्तर्वेदिः) मध्य की वेदिका; अथवा पुं. अम्हारिसो में गंगा और जुमना के बीच का देश; (कुमारपाल अम्हेच्चयं काव्य); १-४। अम्हेत्थ पु. वि (अन्तश्चारी) बीच में जाने वाला; १-६० ।। अयं अन्तेउरं न. (अन्तःपुरम्) राज-स्त्रियों का निवास अयि गृह १-६० अप्पिअं न. (अन्तः पुरम्) राज-स्त्रियों का निवास गृह १-६०१ अ (अन्तर्) मध्य में; १-६०॥ अ (अन्तोपरि) आन्तरिक भाग के ऊपर; १-१४ वीसभं निवेसिआणं वि (अन्तर्विश्रम्भ-निवेसि तानाम्) जिनके हृदय में विश्वास है, ऐसे अरणं निवासियों का; १-६०। अरहन्तो वि (अन्धः ) अन्धा ; २-१७३। अरहो वि (अन्धः ) अन्धा ; २-१७३। अ. (अन्यतः) अन्य रूप से; २-१६०। अ. (अन्यत्र) अन्य स्थान पर; २-१६१। अरिहन्तो अ (अन्यतः) दूसरे से; दूसरी तर्फ; २-१६०। अरिहा वि (अन्योन्यम्) परस्पर में; आपस में १-१५६ ।। अ (अन्यत्र) दूसरे स्थान पर; २-१६१ । अरूणा अ. (अन्यत्र) दूसरे स्थान पर; २-१६१। अरूहन्तो वि (अन्यादृशः) दूसरे के जैसा; १-१४२। अरूहो वि (अन्योन्यम्) परस्पर में; आपस में; १-१५६ अरे वि (आत्मज्ञः) आत्म तत्त्व-को जानने वाला, अरिहइ अपने आपको जानने वाला; २-८३। अलचपुरं वि. (आत्मीयम्) स्वकीय को; निजीय को, २-१५३। वि (आत्मज्ञः) आत्म तत्व को जानने वाला; आत्म-ज्ञानी २-८३। वि (अप्रमत्तः) अप्रमादी; सावधान उपयोग वाला, १-२३१ अप्पणो अ. (स्वयम्) आप; खुद, निज २-१९७ २०९। पुं. (आत्मा) आत्मा, जीव; २-५१। वि (आत्मीयं) आत्मा में उत्पन्न; २-१६३ पुं. (अमर्षः) असहिष्णुता; २-१०५। सर्व (अमुकः) वह कोई अमुक-ढमुक; १-१७७ वकृ. (अजानन्ती) नहीं जानती हुई; २-१९० न. (आम्रम्) आम्र-फल; १-८४; २-५६। (देशज) न. (आम्र-फलम्) आम्रफल; २-५६। वि (आम्लम्) खट्टा; २-१०६। अ. (आश्चर्ये) आश्चर्य अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है; २-२०८। अम्ह (अस्माकम् ) हमारा; १-३३, २-४६, २-२०४; सर्व (अस्मदीयः) हमारा; २-१४७। सर्व (अस्मदीयम्) हमारा; २-९९७१ सर्व (वयम्) हम; १-४०; वि (अस्मादृशः) हमारे जैसा; १-१४२; २-७४ वि. (अस्मदीयम्) हमारा; २-१४९। सर्व अ. (वयमत्र) हम यहां पर; १-४० सर्व (अयम्) यह; ३-७३। अ (अयि) अरे! हे!; २-२१७/ वि (अर्पितम्) अर्पण किया हुआ; भेंट किया हुआ;१-६३। उप्पिअ वि (अर्पित) अर्पण किया हुआ; १-२६९ ओप्पेइ सक (अर्पयति) वह अर्पण करता है; १-६३। ओप्पिअंवि (अर्पितम्) अर्पण किया हुआ; १-६३। समप्पेतून कृ (समर्पित्वा) अपर्ण करके; २-१६४। न. (अरण्यम्) जंगल; १-६६। पु. (अर्हन्) जिनदेव; जैन-धर्म-उपदेशक; २-१११ पु. (अर्हन्) जिनदेव; जिनसे कुछ भी अज्ञेय नहीं है ऐसे देव; २-१११॥ पु. (अरि) दुश्मन, रिपुः २-११७) पु. (अर्हन्) जिनेन्द्र भगवान; २-१११। वि (अर्हा) योग्य; लायक; २-१०४। पु. (अर्हन्) जिनदेव; २-१११। वि. (अरूणः) लाल; रक्तवर्णीय; १-६। पु. (अर्हन्) जिनदेव; २-१११ । पु. (अर्हन्) जिनदेव २-१११ । अ (अरे) अरेः सम्बोधक अव्यय शब्द; २-२०१ सक (अर्हति) पूजा के योग्य होता है; २-१०४। न (अचलपुरम्) एक गांव का नाम; २-११८। अन्तेआरी अन्तेउरं अन्तो अन्तोवरि अन्तो अरि अन्धलो अन्धो अन्नत्तो अनत्थ अन्नदो अन्नन्नं अन्नह अन्नहि अन्नारिसो अन्त्रुन्नं अप्पज्जो अरिहो Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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