Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan

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Page 416
________________ परिशिष्ट-भाग : 383 ईसि उअ उअ उइंदा उउंबरो उऊ उऊहलो उक्कण्ठा, उक्कत्तिओ उक्करो उक्का उद्धं उक्किट्रं उक्केरो उक्खयं उक्खलं उक्खाय उक्खित्तं उग्गमा उग्गयं अ. (ईषत्) अल्प; थोड़ा सा; १-४६; २-१२९ उणा (उ) अ (उत) विकल्प, वितर्क, विमर्श, प्रश्न उणाइ समुच्चय आदि अर्थ मे; १-१७२; २-१९३, २११ सक (पश्य) देखो; २-२११॥ उण्हीसं पु. (उपेन्द्रः) इन्द्र का छोटा भाई; १-६। उत्तरिज्जं, पु. (उदुम्बरः) गुलर का पेड़; १-२७० । उत्तिमा त्रिलिंग, (ऋतुः) ऋतुः दो मास का काल विशेष; उत्थारो १-१३१, १४१, २०९। पु. (उदूखलः) उलुखल; गूगल; १-१७१। उदू उक्कंठा, स्त्री. (उत्कंठा) उत्कण्ठा, उत्सुकता; १-२५,३०। उद्दामो वि (उत्कर्तितः) कटा हुआ; छिन; २-३०॥ पु. (उत्करः) राशि; ढेर; १-५८। स्त्री. (उल्का) से जो एक प्रकार का अंगार-सा उप्पलं गिरता है; २-७९, ८९। उप्पाओ वि (उत्कृष्टम्) उत्कृष्ट, उत्तम; १-१२८। उप्पावेइ पुं.(उत्करः) राशि, समूह; १-५८। वि (उत्खातम्) उखाड़ा हुआ; १-६७। उप्पेहड न. (उदूखलम्) गूगल; २-९०।। वि (उत्खातम्) उखाड़ा हुआ; १-६७) उप्फालइ वि. (उत्क्षिप्तम्) फेंका हुआ; ऊंचा उडाया हुआ; २-१२७। उब्भंतयं वि. (उद्गता) निकली हुई, उत्पन्न हुई; १-१७१। वि (उद्गतम्) ऊंचा गया हुआ; उत्पन्न हुआ उभं १-१२। उभयबलं वि (उच्चस्) ऊंचा; उत्तम; उत्कृष्ट; १-१५४।। उभयोकालं पु. (उत्सवः) उत्सव; २-२२। उंबरो वि (उत्सन्नः) छिन्न-खण्डित; नष्ट; १-११४ उम्मत्तिए पुं. (उक्षा) बैल; सांड; २-१७। उम्हा पुं. (उत्साहः) उत्साह, द्दढ उद्यम, सामर्थ्य; उरो १-११४; २-२१, ४८ उलूहलं पुं. (इक्षु.) ईख; गन्ना; १-२४७। उल्लं पुं. (इक्षुः) ईख; गना; १-९५; २-१७) उल्लविरीइ वि (उत्सुकः) उत्कण्ठित; २-२२। वि. (उत्क्षिप्तम्) फेंका हुआ; ऊंचा उड़ाया हुआ; उल्लावेतिए २-१२७। उल्लिहणे वि (उज्ज्वल:) निर्मल, स्वच्छ, दीप्त, चमकीला; २-१७४। उवज्झायो वि (देशज) पसीना वाला; मलिन; बलवान; २-१७४ उवणि वि (ऋजुः) सरल, निष्कपट, सीधा; १-१३१, १४१; २-९८। अवणीओ वि (उद्योतकराः) प्रकाश करने वाले; १-१७७। पुं. (उष्ट्रः) ऊंट; २-३४। उवमा पु.न. (उडुः) नक्षत्र, तारा; १-२०२। उवमासु अ (पुनः) भेद, निश्चय, प्रस्ताव, द्वितीय वार, उवयारेसु पक्षान्तर आदि अर्थ में; १-६५; १७७॥ अ. (पुनः) भेद, निश्चय, प्रस्ताव, द्वितीयवार, १-६५;२-२१७/ अ. (पुनः) भेद, निश्चय, प्रस्ताव, द्वितीयवार, १--६५। पु.न (उष्णीषम्) पगड़ी, मुकुटः; २-७५ । उत्तरीअंन (उत्तरीयम्) चद्दर, दुपट्टा १-२४८ वि (उत्तमः) श्रेष्ठ; १-४६। पुं (उत्साहः) उत्साह; दृढ़ उद्यम; स्थिर प्रयत्न; २-४८१ स्त्री (ऋतुः) ऋतु; दो मास का काल विशेष; १-२०९। वि (उद्दामः) स्वच्छन्द; अव्यवस्थितः प्रचण्ड: प्रखर; १-१७७। न. (ऊर्ध्वम्) ऊपर, ऊंचा; २-५९। न (उत्पलम्) कमल; पद्म; २-७७। पु (उत्पातः) उत्पतन; ऊर्ध्व-गमन; २-७७। सक (उत्पलावयति) वह गोता खिलाता है; कूदाता है; २-१०६। (देशज) वि. (?) उद्भट, आडम्बर वाला; २-१७४। सक. (उत्पाटयति) वह उठाता है; उखेड़ता है; २-१७४। वि (उद्भ्रान्तकम्) भ्रान्ति पैदा करने वाला; भौंचक्का बनाने वाला; २-१६४। न (ऊर्ध्वम्) ऊपर; ऊंचा; २-५९। न (उभय बलम्) दोनों प्रकार का बल; २-१३८ । न(उभय कालम्) दोनों काल; २-१३८ । पु. (उदुम्बरः) गूलर का पेड़; १-२७०। स्त्री. (उन्मत्तिके) हे मदोन्मत्त! (स्त्री) १-१६९ स्त्री. (ऊष्मा) भाप; गरमी; २-७४। पुंन (उरः) वृक्षः स्थल; छाती; १-३२॥ न (उदूखलम्) उलुखल: गूगल; १-१७१। वि. (आद्रम) गीला; भीजा हुआ; १-८२॥ वि (उल्लपनशीलया) बकवादी स्त्री द्वारा; २-१९३। वि (उल्लापयन्त्या) बकवादी स्त्री द्वारा; २-१९३। वि (उल्लेखन) घर्षण किये हुए पर; १-७॥ सक (आद्रीकरोति) वह गीला करता है; १-८२। पु. (उपाध्यायः) उपाध्याय; पाठक; अध्यापक; १-१७३:२-२६| वि (उपनीतः) समीप में लाया हुआ; अर्पित; १-१०१। पु. वि (उपनीतः) समीप में लाया हुआ; अर्पित; १-१०१। स्त्री (उपमा) सादृश्यात्मक दृष्टान्त; १-२३१ स्त्री (उपमासु) उपमाओं में; १-७। पुं. (उपचारेषु) उपचारों में; सेवा-पूजाओं में; भक्ति में; १-१४५। उच्चअं उच्छओ उच्छण्णा उच्छा उच्छाहो उच्छु उच्छुओ उच्छूढं उज्जलो उल्लेइ उज्ज्वल्ल उज्जू उजोअगरा उट्रो उडू उण Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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