Book Title: Prakrit Vyakaranam Part 1
Author(s): Hemchandracharya, Suresh Sisodiya
Publisher: Agam Ahimsa Samta Evam Prakrit Samsthan

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Page 438
________________ परिशिष्ट-भाग : 405 बिइज्जो बिउणो बिहिओ बिन्दूई बिल्लं देव-गुरू; २-६९,१३७। पुं. (भरत:) ऋषभदेव स्वामी के बड़े लड़के. प्रथम चक्रवर्ती; १-२१४। अ. (भवतः) आप से; १-३७) सर्व (भवन्तः) आप श्रीमान्, तुम; २-१७४ । सर्व (भवन्तः) आप, तुम; १-३७। वि (भवादृशः) तुम्हारे जैसा, आपके तुल्य; १-१४२। वि (भव्यः) सुन्दर, श्रेष्ठ, मक्ति-योग्य: २-१०७ पुं. (भ्रमरः) भंवरा, अलि, मधुकर; १-२४४; बिस बिसी बिहप्पई बिहप्फई २५४। बिहस्सई बीओ बीहेमि बुज्झा बुहप्पई बुहप्फई बुहस्सई बुंधं बेल्लं बोरं बोरी वि (द्वितीयः) दूसरा; १-२४८। वि (द्विगुणः) दो गुणा; दूणा, १-९४, १-७९। भरहो वि (बृहितः) पुष्ट; उपचित, १-११८। बिन्दुणो (बिन्दवः) अनेक बिन्दु अथवा बिन्दुओं भवओ को; १-३४। भवन्तो न (बिल्लम्) बिल्व का फल; १-८५। भवन्तो न (बिस) कमल; १-७, २३८। भवारिसो स्त्री. (वृषी) ऋषि का आसन; १-१२८| पुं (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; २-१३७। भविओ पु. (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; १-१३८; भसलो २-१३७। पु (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; २-६९, १३७। भस्सो सं वि (द्वितीयः) दूसरा; १-५, २४८; २-७९। भाउओ अक. (बिभेमि) में डरता हूं; १-१६९। भाणं सं कृ. (बुद्धवा) बोध प्राप्त करके; २-१५। पुं. (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; २-५३, १३७। भामिणी पुं. (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; २-१३७॥ भायणं पु. (बृहस्पतिः) देवताओं का गुरू; २-१३८,२-५३, १३७॥ भायणा न. (बुध्नम्) मूल-मात्र; २-२६। भारिआ न (बिल्वम्) बिल्व पेड़ का फल; १-८५।। भासा न (बदरम्) बेर का फल; १-१७०। भिउडी स्त्री. (बदरी) बेर का गाछ; १-१७०। भिऊ भिङ्गारो स्त्री (भगिनी) बहिन; स्वसा; २-१२६ । भिङ्गो पुं (भैरव:) भैरवराग, भयानक रस, नदविशेषः भिण्डिवालो १-१५१॥ भिप्फो पुं. (भयः) डर, त्रास; १-१८७। भिब्भलो स्त्री (भार्या) पत्नी, स्त्री; २-२४। पुं. दे. (विष्णुः) विष्णु, श्री कृष्ण; २-१७४। भिमोरो पुं. (भट) योद्धा, शूर, वीर; १-१९५।। वि. (भणितम्) कहा हुआ, बोला हुआ; २-१९३ ।। भिसओ १९९। भिसिणी वि (भणिता) बोलने वाली,कहने वाली; २-१८६। वि (भणन-शीला) बोलने के स्वभाव वाली; भीआए २-१८० भुअयन्तं वि. (भक्तिमान्) भक्ति वाला, भक्त; २-१५९। न (भद्रम्) मंगल, कल्याण; २-८०। न. (भद्रम्) मंगल, कल्याण; २-८०। पुं. (भस्मः ) राख, ग्रह विशेष; २-५१॥ भुज् स्त्री (भूः) नेत्र के ऊपर की केश-पक्ति; २-१६७।। भोच्चा पुं. (भ्रमर) भंवरा, अलि, मधुकर; १-६, २-१८३। भुत्तं पुं. (भ्रमरः) भंवरा, अलि, मधुकर; १-२४४, भुमया (भ) भइणी भइरवो भओ भज्जा भट्रिओ भडो भणि पुं. (भस्मा) राख, ग्रह-विशेष; २-५१। पु. (भ्रातकः) भाई, बन्धु; १-१३१। न (भाजनम्) पात्र, आधार-योग्य, बरतन; १-२६७। स्त्री. (भामिनी) महिला, स्त्री; १-१९०। न (भाजन) पात्र, आधार-योग्य, बरतन; १-२६७; २-२११ भायणाईन (भाजनानि) पात्र, बरतन; १-३३। स्त्री. (भार्या) पत्नी, स्त्री; २-२४, १०७। स्त्री (भाषा) बोली, भाषा; १-२११। स्त्री. (मृकुटी) भौह का विकार, भृकुटी; १-२१०। पुं. (भृगुः) भृगु नामक एक ऋषि; १-१२८। पुं. (भङ्गरः) भ्रमर; भंवरा; १-१२८। पु. (भृङ्ग) स्वर्ण मय जल-पात्र; १-१२८। पुं (भिन्दिपालः) शस्त्र-विशेष; २-३८,८९| वि (भीष्मः) भय जनक, भयंकर; २-५४। वि (विव्हलः) व्याकुल, घबडाया हुआ; २-५८, ९०| देशज ' (हिमोरः) हिम का मध्य भाग (?); २-१७४। पुं. (भिषक्) वैद्य, चिकित्सक; १-२८। स्त्री (बिसीनी) कमलिनी, पदमिनी; १-१३८, २-२१११ स्त्री (भीतया) डरी हुई से; २-१९३। भुआयन्तं न. (भुज-यन्त्रम्) बाहु - यन्त्र, भुजा-यन्त्र; १-४। स्त्री. (भृतिः) भरण, पोषण, वेतन, मूल्य; १-१३१॥ सक खाना, भक्षण करना, भोगना। सक संबं कृ. (भुक्त्वा ) भोग करके; २-१५/ वि (भुक्तम्) भोगा हुआ; २-७७, ८९। स्त्री (भ्रमया) भोंह वाली; आँख के ऊपर की रोम-राजि वाली; १-१२१; २-१६७। अक होना। होई अक (भवति) वह होता है; १-९; २-२०६। हुज्ज विधि (भव, भवतात्) तू हो; २-१८०। होही भूतकाल (अभवत्) वह हुआ; भणिआ भणिरी भत्तिवन्तो भदं भद्द भप्पो भमया भमर भमरो २५४। भमिअ भमिरो सं कृ (भ्रान्त्वा ) घूम करके; २-१४६ वि (भ्रमण-शीलः) घूमने के स्वभाव वाला; २-१४५। भयस्सई पुं. (बृहस्पतिः) ज्योतिष्क देव-विशेष, भयप्पड़ Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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